Friday, October 28, 2016

...क्योंकि राजनीति कोई चुटकला नहीं है



तकदीर के तिराहे पर नवजोत सिंह सिद्धू





-निरंजन परिहार-

सियासत के चक्रव्यूह में सिद्धू की सांसे फूली हुई दिख रही हैं। पहली बार वे बहुत परेशान हैं। जिस पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, और जिसे वे मां कहते रहे हैं, उस बीजेपी से वे अलग हो चुके हैं। कांग्रेस में भाव नहीं मिल रहा है और केजरीवाल की पार्टी सौदेबाजी स्वीकारने को तैयार नहीं लगती। गुरू के साथ राजनीति के मैदान में कोई गेम हो गया लगता है...!


वे क्रिकेटर हैं। राजनेता हैं। कमेंटेंटर हैं। कवि हैं। समां बांधनेवाले वक्ता है। दिखने में सुदर्शन हैं। टीवी एंकर भी हैं। और कलाकार तो वे हैं ही। एक आदमी सिर्फ एक ही जनम में आखिर जो कुछ हो सकता है, नवजोत सिंह सिद्धू उससे कहीं ज्यादा हैं। उनको बहुत नजदीक से जानने वालों को यह कहने का हक है कि जीवन में वे अब अगर और कुछ भी नहीं कर पाए, तो भी उनका चुटीला कविताई अंदाज उन्हें बेराजगारी से तो बचा ही लेगा। लेकिन फिर भी पता नहीं सिद्धू के बारे में ऐसा क्यों लग रहा है कि भस्मासुर के कलयुगी अवतार में आने की वजह से वे जीते जी मोक्ष को प्राप्त होनेवाले हैं। पंद्रह साल के राजनीतिक जीवन में पहली बार नवजोत सिंह सिद्धू को राजनीति के मैदान में अपने खडे होने लायक जगह तलाशनी पड़ रही है। सिद्धू  पहले क्रिकेट में एक बार जीरो पर आउट हुए थे, अब राजनीति में उनका वही हाल होता दिख रहा है। सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, निजी जीवन में भी सिद्धू वक्त न गंवानेवाले व्यक्ति के रूप में मशहूर हैं। लेकिन सन 1990 में जीरो पर आउट होने की बात पर कपिल शर्मा के कॉमेड़ी शो में रह रहकर मजाक का केंद्र बननेवाले इस सरदार के बारे फिलहाल तो यही लग रहा है कि जीवन की सफलताओं के सारे मुकाम पार करने के बावजूद राजनीति में अब वे ऐसे मुकाम पर हैं, जहां पर आकर उनका खराब वक्त आ रहा है या इसे यूं भी समझा जा सकता है कि उनका वक्त खराब हो रहा है।
अपने राजनीतिक जीवन के अस्तित्व की जिस सबसे महत्वपूर्ण जंग के लिए नवजोत सिंह सिद्धू अपनी मां बीजेपी का घर छोड़कर बाहर निकले, हैं, उसका तो सारा आधार ही पंजाब की गरिमा से जुड़ा है। उनके राजनीतिक मोर्चे का नाम तक आवाज-ए-पंजाब है। लेकिन फिर भी मशहूर दिवंगत लेखक सरदार खुशवंत सिंह ने कुछ साल पहले पता नहीं क्यों अपने एक लेख में नवजोत सिंह सिद्धू को बाकायदा जोकर बताते हुए सिख सम्प्रदाय की महिमा को कम करने वाला बता दिया था। यह अपनी समझ से परे हैं। लेकिन ताजा तस्वीर यह है कि बदले हुए राजनीतिक हालात में सिद्धू और उनके राजनीतिक चेले और बाकी साथी आगे बढ़ने की कोई एक लाइन पर नहीं सोच पा रहे हैं। क्रिकेट की भाषा में कहे, तो सिद्धू नई ओपनिंग नहीं कर पा रहे हैं। उनका अकेले चुनाव मैदान में उतरना मुश्किल मामला है। सो, कांग्रेस तो बहुत बाद में पिक्चर में आई, उससे भी बहुत पहले वे केजरीवाल की पार्टी से प्रेमालाप कर रहे थे। लेकिन मामला जब टूटता दिखा, तो वे कांग्रेस की तरफ बढ़े। कांग्रेस ने लचकाया और अमरिंदर सिंह ने भाव नहीं दिया, तो फिर से आम आदमी पार्टी में आस दिखने लगी। बीचे मेंफिर एक बार दिल्ली दरबार में कांग्रेस ने उन्हें आस दिखाई। लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू की संयोग से हमनाम पत्नी नवजोत कौर सिद्धू केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती हैं। नवजोत कौर बीजेपी की विधायक रही हैं और पंजाब सरकार में मंत्री भी। उनके दूसरे साथी वहीं हॉकी टीम के कैप्टन रहे परगट सिंह कांग्रेस की राह पकड़ना चाहते हैं। वे कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह से  लेकर कई बड़े नेताओं से मिलकर बात भी कर चुके हैं। लेकिन सिद्धू हैं कि कांग्रेस टीम में शामिल होने के बजाय उससे गठबंधन करने की राह पर चलना चाहते हैं। न इधर, न उधर, तस्वीर कहीं भी साफ नहीं है।
आप जब यह पढ़ रहे होंगे, तब तक सिद्धू अकेले होंगे, या फिर कहां किसके साथ, कैसे और कहां खड़े होंगे, यह आपको साफ दिख रहा होगा। लेकिन क्रिकेट के पुराने वीडियो फुटेज देखें, तो नवजोत सिंह सिद्धू कभी टीम इंडिया के चमकदार सितारे हुआ करते थे। क्रिकेट के खेल में उनकी सफलता ने सिद्धू की दीन - दुनिया ही बदल गई। वे जब जीतकर लौटते थे, तो हर बार उनका अभिनंदन बहुत शानदार तरीके से होता रहा है। उस स्वागत की शान ऐसी हुआ करती थी, वैसी तो कारगिल के विजेताओं की भी पंजाब ने नहीं देखी। वे क्रिकेट के खेल से ही करोड़पति बने और कॉमेडी के जरिए बने किंग। लेकिन क्योंकि राजनीति न तो क्रिकेट का खेल है और न ही कोई कॉमेड़ी शो। इसलिए राजनीति में आकर वे भरपूर सफल भी हुए और घनघोर असफल भी यहीं से होते लग रहे हैं। राजनीति के आईने में गुरू का गेम बिगड़ता दिख रहा है। क्योंकि कांग्रेस उनके मामले में अपने रुख पर अड़ी है और केजरीवाल उन्हें भाव ही नहीं दे रहे है। और बीजेपी से वे रिश्ता पहले ही इतने खराब तरीके से तोड़ चुके हैं कि वापसी की संभावनाएं लगभग क्षीण हैं। राजनीति में उनकी इस हालत पर सिर्फ यही कहा जा सकता हैं कि नवजोत सिंह सिद्धू तकदीर के तिराहे पर खड़े हैं। जहां से आगे का हर रास्ता उनके लिए पहले से ज्यादा खराब, खतरनाक और बहुत ऊबड़ खाबड़ है।   
पंजाब के पटियाला जिले में जन्मे नवजोत सिंह सिद्धू सिख है, और उनके इस कट्टर शाकाहारी होने के कारण जितने लोग उन्हें पंजाब में पसंद करते हैं, उससे भी ज्यादा उन्हें किसी भी अन्य सिख के मुकाबले देश में ज्यादा पसंद करता है। सन 1983 से लेकर 1999 तक वे टीम इंडिया में क्रिकेट खेलते थे। और क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद बीजेपी के टिकट पर लोकसभा 2004 में अमृतसर से लोकसभा के लिए पहली बार चुने गये। सांसद के रूप में तो सिद्धू ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे देश याद रख सके। लेकिन उनकी तुकबंदियों के मिसरे और चुटकलों के चुटिले अंदाज ने देश को उनका दीवाना जरूर बना दिया। हालांकि वे राजनीति करते हुए जितने चर्चित रहे, उससे ज्यादा उनकी चर्चा एक व्यक्ति की गैर इरादतन हत्या के लिए मिली तीन साल की सजा को लेकर होती है। इस केस के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देकर उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। जहां निचली अदालत के सजा के फैसले पर रोक लगने के बादउन्होंने 2007 में फिर उसी सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस को करीब 75 हजार से भी ज्यादा  वोट  से हराया। इसके बाद वे 2009 में एक बार वहीं से फिर बीजेपी के सांसद बने। और 2014 में उन्हें लोकसभा का टिकट न देकर बीजेपी ने 2016 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। लेकिन कुछ दिन के बाद वे इस्तीफा देकर घर आ गए।
कुल मिलाकर चार बार, तीन बार लोकसभा टिकट पर और चौथी बार राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सांसद के रूप में राजनीति में अपना सिक्का जमानेवाले बड़बोले सिद्दू ने सबसे पहले सम्मान के साथ मिली मिलाई राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी। फिर जिस बीजेपी को वे कभी मां कहते थे, उस मां से भी दामन छुड़ा लिया। लेकिन मातृत्व के रिश्ते को तजने के बाद अब नवजोत सिंह सिद्धू अब असमंजस में हैं। न तो उनके कदम सही पड़ रहे है और न ही उनका राजनीतिक गणित सफल होता दिख रहा है। लेकिन राजनीति में कहते हैं कि जो दिखता है, वह होता नहीं। मगर सिद्धू के साथ तो यही हो रहा है।  सिद्धू के अब तक के राजनीतिक कदमों की तासीर पढ़े, तो स्पष्ट तौर पर यही लगता है कि वे राजनीति की गहराई और उथलेपन की असलियत को अब तक सहज स्वरूप में नहीं समझ पाए हैं। संभवतया वे इसी कारण फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि जाना किधर है। कभी कोई दरवाजा खुलता सा दिखता है, तो उससे पहले ही वह बंद होता भी दिखता है। चुनाव सर पर हैं और वक्त बिता जा रहा है। ईश्वर करे, वे सफल हों, लेकिन फिलहाल तो यही लग रहा है कि सिद्धू की जिंदगी का सबसे खराब राजनीतिक समय उनके दरवाजे पर खड़ा है और वे खुद तकदीर के तिराहे पर। आपको भी ऐसा ही लगता होगा।          
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)


Wednesday, October 12, 2016

मोदी होने के मायने


-निरंजन परिहार-

नरेंद्र मोदी जीत गए। भारतीय लोकतंत्र के अब तक के सबसे प्रचंड बहुमत को साथ बीजेपी को लेकर वे संसद में आ गए। चुनाव तो खैर वे जीते ही हैं, मगर देश का दिल भी जीत कर संसद में पहुंचे हैं। इस जीत के बाद पूरे देश को, और हमारे - आपके जैसे कई करोड़ लोगों को भी लग रहा है, कि जैसे यह मोदी की नहीं खुद की जीत हुई हो। नतीजे आए। और वैसे ही आए जैसा कि उनके आने की उम्मीद किसी और को तो पता नहीं थी या नहीं थी, मगर बीजेपी के कुछ लोगों को जरूर थी। ओम प्रकाश माथुर स्मृति इरानी, मंगल प्रभात लोढ़ा, और अमित शाह जैसे मोदी के बहुत करीबी लोग बहुत पहले से कह रहे थे कि नतीजे क्या और कैसे होंगे। सारे के सारे शुरू से ही 272 के पार की बातें कर रहे थे। लेकिन सीटें आई इससे भी ज्यादा। इन नतीजों का विश्लेषण करें, तो इतना तो साफ है कि देश की जनता ने बीजेपी के कमल को वोट देने से पहले मोदी की छवि में गुजरात के विकास का मॉडल भले ही न देखा हो, मगर एक बहुत मजबूत नेता होने का विश्वास उनमें जरूर देखा। देश को यह विश्वास, न तो राहुल गांधी दिखा पाए, न उनकी माता सोनिया गांधी में दिखा और न ही प्रियंका गांधी में इसका प्रकटीकरण हो पाया। अलग अलग तो छोड़ दीजिए, कुल मिलाकर एक साथ में भी तीनों में लोगों को वह विश्वास नहीं दिखा, जो मोदी में देश ने दिखाया। मोदी ने देश को जगाया कि जो काम साठ महीने में होना चाहिए था, वह कांग्रेस की सरकारें साठ साल में भी नहीं कर पाईं। उन्होंने विकास के लिए उनके गुजरात का मॉडल दिखाया। और लोगों ने भरोसा किया।
हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी सबसे बड़ी बिडंबना यही है कि उसने व्यक्तिवाद और परिवारवाद से आजाद होने की चाहत में कांग्रेस से छुटकारा पाकर मोदी की महानता में खुद को सुरक्षित समझा है। देश जिस वक्त कांग्रेस की व्यक्तिवादी राजनीति की आलोचना कर रहा था और जनता किसी अन्य नेता की तलाश में थी तो संयोग से मोदी के रूप में एक अन्य व्यक्ति देश की आंखों से लेकर मन तक में बसा जा रहा था। देश की जनता को एक ऐसी सरकार चाहिए थी, जो मजबूत लगे, और जिम्मेदारी लेनेवाली लगे। देश को राहुल गांधी जैसा आदमी शक्ल और सूरत से तो पसंद था, मगर जिम्मेदार कभी नहीं लगा। कांग्रेस  जो काम साठ साल में नहीं कर सकी, मोदी भले ही साठ महीने में उन्हें कर पाएं या नहीं, यह अलग बात होगी, लेकिन वे देश की जनता के बीच इस बात को लेकर उम्मीद का आसमान बनाने में भरपूर सफल रहे हैं। सच्चाई यह है कि हमारे देश की जनता को पंचवर्षीय योजनाओं का हिसाब नहीं चाहिए। उसे, काम चाहिए और वह भी बहुत तेज गति के साथ। नरेंद्र मोदी गति के उस प्रबंधन और काम की रफ़्तार के प्रतीक के रूप में पहचान बनाने में कामयाब रहे। दुनिया के किसी भी चुनाव के दौरान अब तक के किसी भी अभियान के मुकाबले मोदी के सबसे तेज, ताकतवार और मजबूत किस्म की तूफानी गति के अभियान का भी इस उम्मीद को जगाने में जबरदस्त सहयोग रहा।
मोदी अब सरकार में हैं। और अगले पांच सालों तक वे निर्बाध रूप से हमारे प्रधानमंत्री रहेंगे। अब कोई नीतिश कुमार नाम का आदमी, मैं भी दाढ़ीवाला हूं, मैं भी मुख्यमंत्री हूं, इसलिए मैं भी पीएम बन सकता हूं जैसे जुमले उछालकर मोदी की बराबरी में न तो खड़ा हो सकता और न ही अपने 99 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जब्त करानेवाली पार्टी का कोई झाड़ूवाल - केजरीवाल बहुत सीधा सादा होने का दिखावा करके सत्ता को चुनौती दे सकता। मोदी ने साठ साल में सत्ता में रही कांग्रेस को उस सिर पीटनेवाली स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जहां गठबंधन से सरकार बनानेवाली देश की सवा सौ साल पुरानी पार्टी कांग्रेस को गठबंधन करके विपक्ष बनाने की मजबूरी को जीना पड़ रहा है। दरअसल, सच तो यह है कि इतना कुछ हो जाने के बावजूद अब भी अगर जिन पार्टियों  को लगता है कि वे नरेंद्र मोदी से मुक़ाबला करना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी पार्टी और सरकारों के कामकाज का तरीक़ा बदल देना पड़ेगा। और सबसे पहले उनको काम करके साबित करना होगा, जो कि मोदी के लिए भी बहुत आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने गुजरात में करके दिखाया।
राजस्थान में मोदी ने कांग्रेस को सूपड़ा साफ कर दिया। 25 में से पूरी 25 सीट उन्होंने जीतीं। ऐसा ही गुजरात, दिल्ली, उत्तराखंड आदि कुखेक राज्यों में हुआ। कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के अब तक के सबसे बड़े पराक्रमी बहुमत के रथ पर सवार मोदी की मारक अदाओं ने बीजेपी के बाहर और भीतर भी अपने तमाम विरोधियों और आलोचकों को अवाक कर दिया है। देश के बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि कांग्रेस अगर आगे भी सोनिया गांधी और राहुल गांधी की पारिवारिक पार्टी नहीं भी बनकर रहती है, तो भी कांग्रेस को अब भूल जाना चाहिए। क्योंकि कांग्रेस अब अगर बदल भी जाएगी तो भी कुछ मामलों में वैसी ही रहेगी। वह निर्वीकार तो कभी भी नहीं बन पाएगी। क्योंकि वहां की सारी अपार और अपरंपार शक्तियां तो अंततः गांधी परिवार और उसकी परंपराओं में ही नीहित रहेंगी। जबकि वक्त की मांग कुछ और है। असल बात यह है कि कांग्रेस को अपना बरसों से चला आ रहा कांग्रेसी वर्क कल्चर बदलना होगा, जो फिलहाल तो आसानी से संभव नहीं दिखता। वैसे, कांग्रेस को आज जो हश्र हुआ है, वह चुनाव के छह महीने पहले से ही सभी को साफ था। कांग्रेस और उसके कारिंदे भी इसे समझ तो रहे थे, मगर आंख पर बंधी पट्टी खोलकर वे देखना ही नहीं चाह रहे थे। 
इस चुनाव के नतीजों को नरेंद्र मोदी की धुंआधार मेहनत और अपरंपार सफलता के पार भी देखना चाहिए। राहुल गांधी का कांग्रेस के कबाड़े में भरपूर योगदान रहा। लंबे समय तक देश के गांव – गली – मोहल्लों में घर – घर घूमने के बाद भी वे देश की माटी के मिजाज को समझ नहीं पाए। फिर कांग्रेस के सत्यानाश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भी कोई कम योगदान नहीं है। जिस पार्टी ने उनको दो दो बार पीएम बनाया, जिसने उनके हर पाप का बचाव किया और जिसको हर तकलीफ में संजीवनी सूंघाकर मजबूत बनाया, उसने कांग्रेस के लिए क्या किया, यह भी सबसे बड़ा सवाल है। आलम यह है कि कांग्रेस का असल वोट बैंक मुस्लिम, देश के बहुत सारे राज्यों में बीजेपी की ताल पर बहुत ज्यादा थिरकने लगा है। मोदी का विकास का मंत्र उसे भी सुहा रहा है। उसने कांग्रेस के हाथ, मायावती के हाथी, एसपी की साइकिल, लालू की लालटेन वगैरह की असलियत समझ ली है। बड़ी संख्या में दलित भी मोदी के नाम पर जुड़ गया है और ओबीसी ने भी कांग्रेस से किनारा करके बीजेपी का दामन थाम लिया है। देश को लगने लगा है कि 42 साल के होने के बावजूद राहुल गांधी 62 साल के बूढ़े होते नरेंद्र मोदी के मुकाबले मेहनत नहीं कर सकते। कांग्रेस को इसीलिए हर जगह, हर तरह से देश ने खारिज कर दिया है। अब कांग्रेस का फिर से खड़ा होना बहुत आसान नहीं लगता।    

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

मोतीलाल ओसवाल को दर्शन सागर अवार्ड




मुंबई। देश के वित्तिय जगत की प्रमुख हस्ती मोतीलाल ओसवाल को इस साल का दर्शन सागर अवॉर्ड मिला है। दर्शन सागर सम्मान अवॉर्ड समिति द्वारा प्रदान किया जानेवाला यह प्रतिष्ठित सम्मान देश भर में शिक्षा, चिकित्सा और समाजसेवा के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर दिया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान है। अवॉर्ड समिति के प्रमुख प्रवीण शाह के मुताबिक राष्ट्रसंत आचार्य चन्द्रानन सागर सूरीश्वर महाराज के सान्निध्य में ओसवाल सहित किरण राज लोढ़ा, शेलेश जवेरी एवं जयंत राही को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया।

सर्वोदय नगर मुलुंड के प्रांगण में आयोजित इस बार के दर्शन सागर सूरीश्वर अवार्ड’ समारोह में राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाड़ु एवं देश के कई अन्य प्रांतों से लोग आए थे। दर्शन सागर सम्मान समारोह समिति के मोती सेमलानी एवं निरंजन परिहार के मुताबिक समारोह में मोतीलाल ओसवाल का राजस्थानी परंपरा से साफा पहनाकर शाल एवं श्रीफल प्रदान कर सम्मान चिन्ह देकर उनका अभिनन्दन किया गया। मुंबई में 19 सितंबर 2016 को आयोजित इस समारोह में लोढ़ा ग्रुप के चेयरमेन मंगल प्रभात लोढ़ा, नाहर ग्रुप के चेयरमेन सुखराज नाहर, भैरव ग्रुप के मदनराज मुठलिया सहित पूर्व मंत्री राज के पुरोहित, मीरा भायंदर की महापौर गीता जैन एवं उद्योग, व्यापार जगत की कई प्रमुख हस्तियों सहित करीब पांच हजार से भी ज्यादा लोग उपस्थित थे। जवेरी, लोढ़ा एवं राही का भी इसी तरह सम्मान किया गया। समिति के प्रवीण शाह एवं मोती सेमलानी ने समारोह में पधारने पर सभी का आभार व्यक्त किया है। सागर समुदाय के गच्छाधिपति रहे आचार्य दर्शन सागर सूरीश्वरजी महाराज की पुण्यतिथि पर पिछले ग्यारह सालों से हर साल दिया जानेवाले यह राष्ट्रीय स्तर का सम्मान समारोह मुलुंड में पहली बार आयोजित हुआ। राष्ट्रसंत आचार्य चन्द्रानन सागर सूरीश्वर महाराज के महामांगलिक प्रवचन से समारोह का समापन हुआ।

एक मुख्यमंत्री की बीमारी पर इतना बवाल... !


-निरंजन परिहार-  
जयललिता बीमार हैं। वे अब 68 साल की हैं और यह नहीं पता कि आप जब यह पढ़ रहे होंगे, तब वे बीमारी से निजात पाकर अस्पताल से अपने घर आ चुकी होंगी या वहीं इलाज करा रही होंगी। लेकिन उनकी बीमारी को लेकर तमिलनाड़ु में ही नहीं, देश भर में जो कोहराम मचा हुआ है वह इससे पहले भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में कभी किसी ने नहीं देखा। एक सीएम के बीमार होने को किसी राष्ट्रीय संकट के सात्विक स्वरूप में देश के सामने खड़ा कर दिए जाने की संभवतया यह पहली घटना है। बाहर क्या घट रहा है, इससे बिल्कुल नावाकिफ जयललिता अस्पताल में जिस अवस्था में हैं, उसके बारे में डाक्टर ही बेहतर बता सकते हैं। लेकिन एक लौहमहिला के शुभचिंतक और अशुभचिंतक दोनों ही इस बार कुछ ज्यादा ही चिंतित है।    


तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री जयललिता को बीते 22 सितंबर को बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत हुई, तो वे चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराई गईं। लेकिन उनकी इस बीमारी की खबर फैलते ही राजनीतिक चक्र पता नहीं कैसे इतनी तेजी से घूमा कि वे जैसे ही अस्पताल में गईं, उनकी सेहत को लेकर, समाज से लेकर सांसदों में और विपक्ष से लेकर विरासत संभालनेवालों तक में हर स्तर पर हर तरह के कयास लगाए जाने लगे। तमिलनाड़ु का विपक्ष उनकी पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पर मुख्यमंत्री की सेहत की जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए सरकार से इस पर बयान जारी करने की भी मांग कर रहा है। तो बीमारी को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में पीआईएल भी लगाई गई। जयललिता के स्वस्थ होने तक अंतरिम मुख्यमंत्री नियुक्त करने की मांग तक की गई। वह भी उस प्रदेश में, जिसने करुणानिधि जैसे बेहद बीमार वृद्ध को बरसों तक सीएम के रूप में देखा है। माहौल ऐसा बनाया गया है जैसे आज तक किसी प्रदेश के सीएम बीमार ही नहीं हुए हों। देश में संभवतया यह पहली बार हुआ है कि किसी सीएम की बीमारी को इस कदर राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई हो और निहायत द्वेषपूर्ण तरीके से सोशल मीडिया पर जयललिता को दिन में कई कई बार मरा हुआ भी घोषित कर दिया गया हो। तमिलनाडु पुलिस ने अपनी मुख्यमंत्री की सेहत के बारे में गलत और जानकारी फैलाने के आरोप में कुल 44 मामले दर्ज किए हैं। और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। लेकिन लोग हैं कि अफवाहें फैलाने से बाज ही नहीं आ रहे। शुक्र है जयललिता जिंदा है और जिंदगी को जिस भी हाल में जी रही है, वहां से वे ठीक होकर लोटें, यह कामना करनेवालों की भी कमी नहीं है। दरअसल, जयललिता ठीक हैं भी और ठीक नहीं भी हैं। ठीक वह इस मायने में हैं कि उम्र के जिस दौर में वे हैं, उसमें शरीर वैसे भी कोई बहुत ज्यादा समर्थ अवस्था में साथ नहीं देता। उम्र के लिहाज से वे सत्तर साल के करीब हैं और इस उम्र में असकर सारे लोग अस्पताल आते जाते रहे हैं। लेकिन अगर जयललिता को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ी, तो ठीक है। पर, बार बार उनको लेकर किसी भी तरह की अफवाहें उड़ाने की किसी को छूट क्यों दी जानी चाहिए।  

तमिलनाड़ु में 32 साल से चली आ रही हर बार सरकार बदलने की परंपरा का राजनीतिक इतिहास उलटते हुए जयललिता लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए इसी साल 23 मई 2016 को छठी बार मुख्यमंत्री के बनीं थीं। तब से लेकर आज तक करुणामिधि और उनकी पार्टी ने जयललिता के खुंदक निकालने का कोई मौका नहीं छोड़ा। ताजा विवाद के पीछे भी करुणनिधि की पार्टी डीएमके का कमाल ज्यादा माना जा रहा है। कर्नाटक के मंड्या जिले के पांडवपुरा तालुका के मेलुरकोट गांव में 24 फ़रवरी 1948 को एक 'अय्यर' परिवार में जन्मी जयललिता देश की राजनीति में ताकतवर महिला के रूप में अपने चमत्क़त कर देनेवाले अंदाज में आज भी हैं और कल भी थीं। डीएमके पार्टी के करुणानिधि से उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी की हदें दुनिया देख ही चुकी हैं। लेकिन उनकी ताकत को भी लोग मानते हैं। इसी कारण तमिलनाड़ु के लोग जयललिता को आदर के साथ अम्मा कहते हैं। वे खबरों को अपने तानेबाने में बुनती रही है। शायद, यही वजह है कि उनका अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होना भी रोज खबरों पर खबरें बरसाए जा रहा है। रोज कोई न कोई बड़ा नेता जयललिता से मिलने अस्पताल पहुंच रहा हैं। कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी भी चार दिन पहले उनसे अस्पताल जाकर मिल आए हैं। हालांकि कुछ साल पहले पता नहीं किस मंशा में सुश्री जे. जयललिता ने कांग्रेस को भंग करने की बात कही थी। और अपनी बात को साबित करने के लिए बहुत सारे साक्ष्य भी खोज लिए थे। जयललिता का कहना था  कि देश की स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी को भंग करना चाहते थे। अपनी बात साबित करने करने लिए अम्मा आक्रामक रूप से जो बहुत सारे दस्तावेज भी लाई थीं। उनमें से दी कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी-वॉल्यूम 90के वे कुछ अंश भी उन्होंने विधानसभा में पढ़े, जिनमें महात्मा गांधी ने यह भावना व्यक्त की थी कि देश आजाद हो गया है, अब कांग्रेस की जरूरत नहीं है। जयललिता ने तब यह भी कहा था कि कांग्रेस को अब समाप्त कर देना चाहिए। उस समाप्त कर दी जानेवाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का दिल्ली की रैली में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शहीदों के खून का दलाल बताने के दूसरे ही दिन जयललिता का हाल जानने चेन्नई पहुंचना बहुत लोगों को भले ही समझ में नहीं आया। लेकिन इस यात्रा की राजनीतिक सोच यही थी कि प्रधानमंत्री को शहीदों के खून का दलाली करनेवाला बताने से मचे हंगामे से मामला जयललिता के स्वास्थ्य की तरफ शिफ्ट हो जाएगा। मतलब, साफ है कि राहुल गांधी ने भी जयललिता की बीमारी को भी अपने लिए राजनीतिक ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की।

कुल मिलाकर जयललिता बीमार है और ईश्वर करे, उन्हें कोई बहुत गंभीर बीमारी भले ही न हो, लेकिन लोग उसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले रहे हैं, यह बहुत ज्यादा गंभीर बात है।। उनकी बीमारी पर पर विवाद भी बहुत हो रहा है। लेकिन असल में देखें, तो विवादों को जन्म देना तो असल में जयललिता का शगल रहा है और उनसे घिरे रहना उनकी किस्मत का हिस्सा। विवाद शायद इसीलिए जयललिता का पीछा नहीं छोड़ते। वैसे जयललिता रणनीति की भी उस्ताद रही हैं। वे एक सोची समझी रणनीति के तहत अपनी हीरोइन मां का दामन थामकर किसी लाजवंती नायिका की तरह तमिल सिनेमा में आईं और एमजीआर के नाम से बहुत प्रसिद्ध तब के वहां के सुपर स्टार एमजी रामचंद्रन की परम सखी के रूप में छा जाने की रणनीति में कब सफल हो गईं, किसी को पता भी नहीं चल सका। बाद में रामचंद्रन राजनीति में घुसे। चूंकि वे सुपर स्टार थे, इसलिए उनके नाम से पार्टी चलने लगी। और राजनीतिक कारणों से तो नहीं पर श्रृंगारिक कारणों की वजह से अपनी रणनीतियों के तहत जयललिता स्वयं को एमजीआर का सच्चा उत्तराधिकारी मानती थीं, जिसमें वे सफल भी रहीं। एमजीआर की बाकायदा धर्मपत्नी होने के बावजूद बेचारी जानकी तो कहीं किसी भी परिदृश्य में भी नहीं थी। हर जगह जयललिता ही एमजीआर के साथ दिखतीं। उन रणनीतिबाज जयललिता से कांग्रेस का कलह शुरू से ही रहा। लेकिन फिर भी वे कांग्रेसियों के फाइनेंस की हुई फिल्मों में भी जयललिता भरपूर नखरे किया करती थी। छठी बार सीएम बनना कोई हंसी खेल नहीं है। यह राजनीति का शिखर है। उसी शिखर पर बैठी अम्मा अकसर लोगों को मुंहतोड़ जवाब देती रही हैं। राजनैतिक जीवन के दौरान जयललिता पर सरकारी पूंजी के गबन, गैर कानूनी ढंग से भूमि अधिग्रहण और आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगे। उन्हें आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में सजा भी हुई और मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ा पर वे कभी जिंदगी से नहीं हारी नहीं। भीषण किस्म के भ्रष्टाचार के मामलों और कोर्ट से सजा होने के बावजूद वे अपनी पार्टी को संसद से लेकर विधानसभा में भारी बहुमत के साथ जिताने में सफल रहीं। इसीलिए जो लोग अम्मा को जानते हैं, वे यह भी मानते ही हैं कि अस्पताल की भवबाधाओं से मुक्ति पाने के बाद वहां से बाहर निकलकर जयललिता के शरीर ने साथ दिया तो, वे चुप नहीं रहेंगी, यह तय है। वैसे भी हर बात पर कोहराम मचाना और कुछ भी चुपचाप सहन कर जाना उनकी आदत का हिस्सा नहीं है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Monday, May 25, 2015

Jewel Trades: India's Premier Jewellery Magazine




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‘Jewel Trades’ magazine provides latest information about trade. Market trades, Export - import data, Official policies and Formulations, technological advancements, fairs-festivals-exhibitions across the world and much more are elaborately included in Jewellery World.  ‘Jewel Trades’ is highly reputed for its focused content and top quality editorial standards, deeply coverage of the Gold, Diamond, Gems and Jewellery industry, creative design, rich imagery and printing on glossy art paper with modern technology.


 ‘Jewel Trades’ is a monthly magazine with contents which the Indian Jeweller would really like to know and sell. The main topics are latest trends in jewellery stores, visual merchandising,
Sales / counter-sales promotion, retail brands, new openings, detailed surveys, international designs entering India and knowledge news, industry expert’s views and market leaders comments, etc.  ‘Jewel Trades’ magazine is published from Mumbai and favourable read in more than 10 countries of the world. To facilitate Hindi speaking Gold and diamond jewellery traders, manufactures, artisans, ‘Jewel Trades’ is published in Hindi and English both language. It’s readership comprises Gold, Silver, Platinum, diamond and precious stones Jewellers, manufacturers, bullion traders, dealers, importers, exporters, cutters, polishers, jewellery designers, geologists, miners, students etc.


Editor: Sakshi Tripathi

Managing Editor: Niranjan Parihar / +919821226894
Executive Editor: Rakesh Dubey / +919322931003
Asst. Editor (Marketing): Yashpal Chauhan / +918698252103
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