Monday, May 7, 2012
वसुंधरा की धरा में बीजेपी की औकात
-निरंजन परिहार-
बीजेपी के सबसे बड़े पद पर बैठे नीतिन गड़करी को अब यह सलाह देने का मन करता है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर किए जाने वाले आचरण को उन्हें समझ लेना चाहिए। गड़करी अगर यह नहीं समझे, तो उनकी गिनती भी जना कृष्णमूर्ति और वेंकैया नायडू जैसे पार्टी को डुबोने वाले जोकरों में होगी, यह पक्का है। गड़करी को अपन यह सलाह नहीं देते। लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में जो कुछ हो रहा है, उसके बाद बीजेपी के चाल, चेहरे और चरित्र में आए कलंकित कर देनेवाले बदलाव को बहुत आसानी से समझा सकता है। पार्टी में अनुशासन के मामले में इतनी गिरावट आ जाए, और राष्ट्रीय नेतृत्व पूरे मामले को नौटंकी की तरह देखता रहे, यह सिर्फ बीजेपी में ही हो सकता है।
वसुंधरा राजे एक बार फिर खबरों में है। यह तो खैर कोई खबर है ही नहीं कि राजस्थान बीजेपी में घनघोर अंतर्कलह है। खबर यह भी नहीं है कि पार्टी से इस्तीफा देने की धमकी देकर वसुंधरा ने गुलाबचंद कटारिया की लोक जागरण यात्रा को रुकवा दिया है। और खबर यह भी नहीं है कि वसुंधरा अपने आप को राजस्थान में बीजेपी की सबसे बड़ी नेता साबित करने में एक बार फिर पूरी तरह सफल हो गई हैं। असल खबर यह है कि वसुंधरा राजे ने इस प्रकरण के जरिए पूरी बीजेपी को यह संदेश दे दिया है कि उनके वहां होगा वही, जो वह चाहेगी। ना तो दिल्ली की चलेगी और ना राजस्थान की किसी और बिल्ली की चलेगी। और वसुंधरा के सामने पूरी बीजेपी के एक बार फिर बौनी और बेजार साबित हो जाने से भी बड़ी खबर यह है कि जो लोग अगले साल बीजेपी को सत्ता में पक्का आता हुआ देख रहे थे, वे बहुत सहम गए हैं। इस घटना से उनको लगने लगा है कि हालात अब भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। अंदर का माहौल पिछले चुनाव जैसा ही है। वसुंधरा का अड़ियल रवैया भी बिल्कुल वैसा ही है, जिसकी वजह से पिछली बार पूरी पार्टी डूब गई थी। अपन आज तक यह तो नहीं जान पाए कि ये बांछें होती कहां हैं, पर इतना जरूर जानते हैं कि बीजेपी में इस बवाल के बाद राजस्थान में कांग्रेस और अशोक गहलोत की बांछे बहुत खिल रही हैं।
मामला सिर्फ इतना सा है कि गुलाबचंद कटारिया मेवाड़ इलाके में बीजेपी के प्रति सदभावना जगाने के लिए लोक जागरण यात्रा निकाल रहे थे। जो, वसुंधरा राजे के चंगुओं को नागवार गुजर रही थी। उनको लग रहा था कि इससे कटारिया का कद बहुत बढ़ जाएगा और उनकी औकात घट जाएगी। सो, चंगुओं के चेताने पर वसुंघरा जागी और अपने कद और पद की गरिमा के बारे में बिना बहुत कुछ सोचे समझे कूद पड़ी मैदान में। वसुंधरा के चंगुओं की चिंता यह है कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। अगर कटारिया रथयात्रा निकालते तो जाहिर है उनका कद बड़ा होता। वे राजस्थान में पहले से ही बहुत बड़े नेता हैं, सो मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में उनका नाम भी शामिल हो जाता। मेवाड़ के जिस इलाके में कटारिया की इस यात्रा को निकलना था वहां विधानसभा की 30 सीटें आती हैं, जिन पर कटारिया के पक्ष में सीधा असर पड़ता। जो लोग राजनीति का ककहरा भी नहीं जानते, वे भी इतना तो जानते ही है यह कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं था, कि वसुंधरा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा करनी पड़े। लेकिन वसुंधरा राजे ने यह किया। जानने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वसुंधरा राजे जो भी करती है, पूरी ताकत के साथ करती है। अपने सभी समर्थक विधायकों के भी इस्तीफे की बात से वसुंधरा ने पार्टी को धमकाया। तो, अकेली वसुंधरा के सामने इतनी बड़ी बीजेपी लुंज पुंज और लाचार नजर आने लगी। परंपरा तो यही है कि लोग अकसर पार्टी के सामने झुकते हैं। पर अपने सामने पूरी पार्टी को झुकाने के साथ उसकी औकात दिखाकर वसुंधरा ने यह तो साबित कर ही दिया है कि राजस्थान में सिर्फ और सिर्फ वही बीजेपी को झुकाने वाली नेता है। पूरे मामले में सबसे चोंकानेवाली बात यह रही कि राजस्थान में वसुंधरा के सबसे कट्टर विरोधी सांसद ओम प्रकाश माथुर भी उनके समर्थन में खड़े नजर आए। मगर, आप ही बताइए कटारिया अगर यात्रा निकालते तो फायदा उनका भले ही हो जाता, पर ज्यादा फायदा तो बीजेपी का ही होता। पर, यात्रा रुकवाने का मतलब यही है कि बीजेपी का फायदा भी वसुंधरा को मंजूर नहीं है।
गुलाब चंद कटारिया राजस्थान में बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं। छठी बार विधायक हैं। सांसद रहे हैं। कई बार मंत्री रहे हैं और राजस्थान में पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। वसुंधरा से भी पहले राजस्थान में विपक्ष के नेता भी रहे। इतने अच्छे वक्ता हैं कि वसुंधरा ही नहीं कई लोग उनकी भाषण कला की कॉपी करते हैं। सन 1977 के बाद से ही वे किसी ना किसी संवैधानिक पद पर हैं। और उससे भी ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे राजस्थान में कटारिया एक बहुत ही नेक इंसान और ईमानदार राजनेता के रूप में विख्यात हैं। यही वजह है कि बेहद सरल मन वाले कटारिया का नाम राजस्थान के सबसे सम्मानित नेताओं में सबसे पहले लिया है। लेकिन राजनीति के रीति रिवाजों का भी अपना अलग मायाजाल है। वहां ना तो अच्छेपन की कोई कद्र है और ना ही ईमानदारी का कोई सम्मान। कटारिया की यात्रा को भी इसीलिए रुकना पड़ा। लोक जागरण यात्रा निकालने वाले कटारिया ने पार्टी हित में यात्रा को निरस्त करने का ऐलान कर दिया।
अपने आसपास के लोगों को बिल्कुल बौना बनाए रखना राजे की राजनीति की सबसे बड़ी तासीर है और अपने से बड़े होते नेताओं को किसी भी तरह खत्म कर देना उनकी राजनीति का हिस्सा। वे जो चाहती है, हर कीमत पर करके रहती है। और अकसर वह कुछ ऐसा करती है, जिससे एक तीर में कई शिकार हो जाए। इस बार भी वसुंधरा ने कुछ ऐसा ही किया है। अगले साल राजस्थान में विधानसभा चुनाव हैं, और चुनाव तक वसुंधरा ऐसा कुछ भी होने देना नहीं चाहती, जिससे उनकी ताकत को कहीं से भी रत्ती भर की भी चुनौती की गुंजाइश पैदा हो सके। कटारिया की यात्रा को रोकने के लिए इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा दांव खेला। लेकिन राजनीति में ऐसे खेल सिर्फ बीजेपी में ही हो सकते हैं। यही वजह है कि नीतिन गड़करी को अध्यक्षीय आचरण सीखने की सलाह देने को अपन मजबूर हुए। सलाह गलत तो नहीं लगी ?
(लेखक निरंजन परिहार जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं)
Saturday, March 17, 2012
परिहार की नई पुस्तक की पहली प्रति राष्ट्रपति को

जाने माने राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया विशेषज्ञ निरंजन परिहार द्वारा विख्यात जैन संत आचार्य चंद्रानन सागर सूरीश्वर महाराज पर लिखित पुस्तक ‘एक राष्ट्र, एक संत’ की पहली महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल को भेंट की गई। मुंबई के राजभवन में आयोजित एक भव्य समारोह में देश भर से आए करीब सवा सौ से भी ज्यादा प्रतिष्ठित एवं जाने माने लोगों की उपस्थिति में प्रति युवा समाजसेवी प्रवीण शाह और निरंजन परिहार ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंपी। शिक्षा, चिकित्सा और समाज हेतु चालीस सालों से काम करनेवाले आचार्य चंद्रानन सागर को राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रसंत सम्मान प्रदान किए जाने के विशेष मौके पर इस पुस्तक का प्रकाशन किया गया है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख, सांसद राज बब्बर, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, लोकसभा अध्यक्ष रहे मनोहर जोशी, संगीतकार रवींद्र जैन, उपराष्ट्रपति रहे स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत सहित करीब चालीस से ज्यादा देश के जाने माने लोगों से निरंजन परिहार की आचार्य चंद्रानन सागर के बारे में की गई बातचीत के अंश इस पुस्तक में समाहित है।
मुंबई के राजभवन में आयोजित राष्ट्रसंत सम्मान समारोह में लोकप्रिय समाजसेवी कनकराज लोढ़ा, नाहर ग्रुप के चेयरमेन सुखराज नाहर, वरुण इंडस्ट्रीज के चेयरमेन किरण मेहता, एमएम ग्रुप के सीएमड़ी रमेश मूथा, भैरव लाइफस्टाइल के चेयरमेन मदन मुठलिया, आरएसबीएल के चेयरमेन पृथ्वीराज कोठारी, सेलो ग्रुप के सीएमड़ी घीसूलाल बदामिया, कॉसमॉस ग्रुप के डायरेक्टर मनीष मेहता और पारस जैन के अलावा मलबार हिल के विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा, मुंबई भाजपा के अध्यक्ष राज के पुरोहित, वरुण ग्रुप के कैलाश अग्रवाल और वरिष्ठ समाजसेवी इंदरभाई राणावत, रॉयल चेन के चेयरमेन फुटरमल जैन, सुरेश जैन सहित कई उद्योगपति एवं जाने माने लोग इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित थे।
Sunday, December 4, 2011
जिंदगी की असलियत के आदमी थे देव आनंद


-निरंजन परिहार-
यूं तो पूरी जिंदगी खबरें उनको और वे खबरों को बुनते रहे। दोनों एक दूसरे में से बहुत अच्छे को चुनते रहे। फिर, इसी चुने हुए में से अपनी जिंदगी का ताना बाना बुनते रहे। और यही सब करते करते दुनिया को वे खुद के महत्वपूर्ण होने का अहसास भी कराते रहे। देव आनंद हमेशा बहुत महत्वपूर्ण बने रहे। वैसे वे महत्वहीन तो कभी नहीं थे। लेकिन मौत ने उनको एक बार फिर बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है। वे जिंदगी भर, जिंदगी के सामने, जिंदगी से भी बड़े सवाल खड़े करते रहे। और जीते जीते तो कर ही रहे थे, जाते जाते भी जिंदगी को यह सवाल दे गए कि कि आखिर 88 साल की ऊम्र तक जीवन के आखरी पड़ाव पर भी कोई इंसान इतना सक्रिय कैसे रह सकता है।
सवाल सचमुच बहुत बड़ा है। मगर जिंदगी उससे भी बड़ी है। जो लोग भरपूर जवानी के जोश में भी जिंदगी की सच्चाइयों के सामने लड़खड़ाकर चूर हो जाते हैं, उनको देव आनंद के इतनी ऊम्र में भी सक्रिय रहने और काम करते रहकर जिंदगी को जीतने की उनकी ललक के कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए। और जो लोग दो-चार फिल्में बनाने के बाद लुप्त हो गए, उनको मौत के दिनों के आसपास भी देव आनंद के 38वीं फिल्म बनाने की तैयारी की वजहें तलाशनी चाहिए। और, जो लोग अच्छे अभिनेता, खूबसूरत चेहरे और संपर्कों – संबंधों का व्यापक विस्तार वाले लोग होने के बावजूद कुछेक फिल्मों में काम करने के बाद आउट हो गए, उनको देव आनंद के 110 से भी ज्यादा फिल्मों में लीड रोल करने के कारण जरूर जान लेने चाहिए। देव आनंद तो चले गए, मगर उनका नाम रहेगा। नाम इसलिए, क्योंकि उनकी जिंदगी में आशाओं के टूटने, हिम्मत हारने और कुछ आराम कर लेने के साथ साथ पीछे मुड़कर देखने के लिए कोई जगह नहीं थी। देव आनंद कहते थे – ‘जिंदगी जब हर सुबह एक दिन आगे बढ़ जाती है। वह थकती नहीं। हारती नहीं। रुकती नहीं। पीछे मुड़कर देखती नहीं। हर रोज वह हमारे साथ नए नए प्रयोग करती रहती है। रोज विकसित होती रहती है। तो फिर हम उसको उसी के अंदाज में क्यों नहीं जिएं।’
देव आनंद की जिंदगी की पटकथा, किसी रहस्य, रोमांच और परीकथा से कम नहीं लगती। वे सारे विषयों पर बात करते थे, खुलकर बोलते थे और बेबाक बात करते थे। लेकिन सुरैया का नाम आते ही उनकी जुबान तो चुप हो जाती थी और आंखे बोलने लगती थीं। 80 साल की ऊम्र में लोगों की आंखें बहुत थक जाती हैं। लेकिन अपन ने उन आंखों में भी भरपूर जवानी के जोश को जोरदार उफान मारते देखा है। यह तब की बात है, जब उनको दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला था। साल था 2003, और जगह थी मुंबई में बांद्रा स्थित पाली हिल का उनका आनंद स्टूडियो। दूसरी मंजिल के बड़े से हॉल के एक कोने में लेंप की रोशनी में वे कुछ पढ़ रहे थे। अपन जैसे ही उन के पास पहुंचे, वे अचानक उछलकर खड़े हो गए और लपक कर पास आते ही गले लगाकर बोले - ‘तुम तो बिल्कुल सही वक्त पर आ गए...।’ अपन बोले - ‘देव साहब, आपने वक्त की कीमत दुनिया को सिखाई है, आपको इंतजार करवाकर हम क्या पा लेंगे।’ वे चुप थे... एकदम चुप। फिर अपने साथ के बाकी तीन लोगों का परिचय पूछकर जिंदगी की बातें करने लग गए। लेकिन सिर्फ जिंदगी की बात ही क्यूं... फिल्मों की बात क्यूं नहीं ? इस सवाल पर उनका कहना था – फिल्में तो जिंदगी का एक हिस्सा है। मगर फिर भी फिल्मों में पूरी जिंदगी दिखती है। इसीलिए फिल्में हमें अकसर जिंदगी से भी ज्यादा हसीन लगती हैं। सारे लोग कहते हैं कि फिल्में बदल गई है, फिल्मों में बहुत कुछ नया आ गया है। मगर देव आनंद फिल्मों में आज के दौर के बदलाव को बदलाव नहीं मानते थे। उनका कहना था - ‘कुछ नहीं बदला। वही प्यार है। वही संगीत है। वही किस्से हैं, कहानियां हैं। वही एक दूसरे के प्रति भावनाओं से भरी बातें हैं। क्या बदला है ? सिर्फ लोग ही तो बदले हैं, नए लोग आए हैं, नई तकनीक आई है। मगर फिल्में कहां बदली है। साठ साल में तो कुछ भी नहीं बदला।’
दरअसल, देव आनंद कला और ग्लैमर के संसार में वक्त को जीतनेवाली उस पूरी पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसके लिए जिंदगी इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि इससे बड़ा नाटक और कोई है ही नहीं। यही वजह रही कि वे जब तक जिए, लोग उनकी जिंदगी में जीने की नाटकीयता की तलाश हर पल करते रहे। मगर कोई भी, किसी भी मोड़ पर देव साहब के जीवन की नितांत निजता में जी हुई नौटंकी को पकड़ नहीं पाया। क्योंकि वह थी ही नहीं। वे कहते थे, बहुत सारे लोग उनके पास आते हैं, और उनके जीवन में कलाकार और स्टार होने के बीच के फर्क पर बात करते हैं। मगर वे इसमें कोई फर्क नहीं मानते थे। उनके लिए स्टार होना भी इंसान होना ही होता है। यह कोई और कहता तो शायद समझ में नहीं आता। मगर देव आनंद की जिंदगी के जरिए यह सब देखना, समझना और कहना और भी आसान हो जाता है, क्योंकि फिल्म जगत के वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिनकी निजी जिंदगी का रहन सहन भी किसी बहुत बड़े सुपर स्टार से कम नहीं था, और असल जिंदगी में भी वे सिर्फ और सिर्फ एक सहज कलाकार ही थे। फिर चाहे वह उनका बात करने का लहजा हो, चलने का अंदाज हो या फिर आम आदमी से कई हजार गुना ज्यादा ऊंची उनकी लाइफ स्टाइल। हर किसी को साफ लगता था कि निजी जिंदगी में वे पूरी तरह फिल्मी थे, और फिल्मों में वे पूरी तरह असल आदमी। सच कहा जाए तो, फिल्म और जिंदगी के बीच खड़ा आदमी उनको कहा जा सकता है। क्योंकि वे सिनेमा के होते हुए भी आम आदमी के आदमी थे। 26 सितंबर 1923 को पाकिस्तान में तब के गुरदासपुर और अब के नारोवाल जिले में वकील पिशोरीमल आनंद के घर हुआ और 20 साल की ऊम्र में 1943 में वे मुंबई आ गए। तीन साल बाद 1946 में उनकी पहली फिल्म आई – ‘हम एक हैं’ और 1950 में ‘प्रेम पुजारी’ से उन्होंने निर्देशन शुरू किया। कुल 110 से भी ज्यादा फिल्में Gनके खाते में दर्ज हैं। 4 दिसंबर 2011 को लंदन में उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया।
जिंदगी के बारे में उनका नजरिया बहुत साफ था। वे कहते थे - ‘मन को जो अच्छा लगे, कर लो। क्योंकि कोई भी काम करने जाओ तो लोग पहले रोकते हैं। टोकते हैं। लेकिन जब आप अपनी पसंद का वो काम कर लेते हैं, तो दुनिया भी उसको पसंद करने लगती है। फिर जो दुनिया पहले आपको रोक रही थी, वही आपको उस काम की तारीफ भी करने लगती है। शायद यही वजह रही कि देव आनंद ने वही काम किया, जिसकी उनके दिल ने गवाही दी।’ फिर वह चाहे धारा के विरुद्ध फिल्में बनाना हो, इंदिरा गांधी की इमरजैंसी का विरोध करना हो, या फिर निजी जिंदगी में भरपूर प्रेम करना। वे हमेशा घनघोर रात के अंघेरे में भी समंदर की लपलपाती लहरों के विरूद्ध चले और उन पर जीत दर्ज करके दुनिया को अपनी जिंदगी का जज्बा दिखाया। इसीलिए कहा जा सकता है कि देव आनंद अकारण नहीं जिए। वे जानते थे, और कहते भी थे कि बहुत सारे लोग पैदा होते हैं, जीते हैं और बहुत सारा काम करके मर जाते हैं। मगर जिंदगी के आखरी मुकाम पर उनके पास गिनने के लिए कुछ नहीं होता। देव आनंद आखरी सांस तक उन कारणों को साथ जीते रहे, जिनका समाज, सिनेमा और इंसान से वास्तविक रिश्ता है। जो लोग जिंदगी को पुरस्कारों में तब्दील करने की ललक नहीं पालते। और सम्मानों में समाहित होने से दूर रहते हैं, जिंदगी भी उनके सामने जरा झुक कर ही चला करती है। देव आनंद इसी तासीर के आदमी थे। उनकी जिंदगी को देखकर साफ कहा जा सकता है कि देव आनंद हमेशा जिंदगी के सामने सर उठाकर जिए और जब तक जिए, जिंदगी उनके सामने जरा झुककर ही चली। बात सही है ना... !
(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Friday, December 2, 2011
जिग्ना के बहाने पत्रकारिता की पड़ताल


-निरंजन परिहार-
मीडिया अपनी दिशाओं से भटक गया है। समाज के हक में खड़े होने के बजाय वह अपराधियों के महिमा मंडन में लगा है। इसके लिए जिम्मेदार अपराध कवर करनेवाले हमारे मक्कार मित्रों के चालाक तर्कों या कुतर्कों का तो खैर कोई जवाब नहीं। लेकिन आपसे एक विनम्र सवाल है... दिल पर हाथ रखकर बिल्कुल ईमानदारी से जवाब दीजिएगा। सवाल यह है कि राजनीति कवर करते करते बहुत सारे पत्रकार नेता बन गए। फिल्में कवर करते करते कई पत्रकार फिल्मों में एक्टिंग करने के अलावा निर्माण और निर्देशन में लग गए। खेल कवर करते करते कई पत्रकार खेल बोर्ड के चेयरमेन, टीम मैनेजर और टूर्नामेंट के आयोजक बन गए। बिजनस कवर करते करते कई पत्रकार स्टॉक ब्रोकर और बिजनसमैन बन गए। तो अपराध की दुनिया की खबरों को जीनेवाले किसी पत्रकार का मुकाम क्या होगा ? अगर वह अपराधियों की गोलियों का शिकार बन जाए, या जेल चला जाए, तो किस मामले की हाय तौबा और किस बात की तकलीफ ?
जिग्ना वोरा अपने जीवन में जो चाहती थी, अपना मानना है कि वह मुकाम उसे मिल गया। वह खबरों में रहना चाहती थी, खबरों को जीना चाहती थी और अपराध की खबरों के जरिए प्रचार पाकर अपराध की खबरों में छा जाना चाहती थी। वह छा गई। खबर लिखकर जीते जी अमर हो जाने की कोशिश में उसने जो किया, उसी की वजह से वह अब खबरों में है। लेकिन उसने जो कुछ किया, या शुभचिंतकों की बात मानकर यह कहें कि उससे जो भी हो गया, उसका अंजाम जेल के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकता था, यह तो वह जानती ही थी। और नहीं जानती थी, तो वह बेवकूफ थी। वैसे भी, अपराध की दुनिया की तासीर यही है कि उसे करनेवाला, करवानेवाला और किए हुए को जीनेवाला भले ही वह समझदार हो या भोंदू, अंतत: खुद भी उसी के तानेबाने का अटूट हिस्सा बन जाता है। अपराध कवर करते करते लोग अपराध के अंजाम में पूरी तरह समा भले ही नहीं जाते तो, उसका हिस्सा तो बन ही जाते हैं। कई सारे खबरी भी बन जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे राजनीतिक पत्रकारिता करते करते हमारे बहुत सारे साथी राजनीति में आ गए। संजय निरुपम, राजीव शुक्ला और अरुण शौरी की तरह सितारा बन गए। तो उनके जैसे कई लोग पार्टियों के प्रवक्ता और पदाधिकारी बन गए।
मुंबई में अपराध कवर करनेवाले हमारे भाई लोग जे डे के मारे जाने पर छाती पीट पीट कर बहुत हाय तौबा मचा रहे थे। मोर्चे निकाल रहे थे। धरने दे रहे थे। प्रदर्शन कर रहे थे। मगर जिग्ना के जेल जाने पर सब मौन हैं। इतने मौन कि अनजाने नंबरों से कॉल आने पर भी उनको सांप सूंघने लगा है। किसी बड़े पुलिस अफसर का फोन आने पर उससे बात करने से पहले पैर और फिर होठ थरथराने लगे हैं। और अपने कॉल टैप होने का अंदेशा, हर उस पत्रकार को हो रहा है, जिसकी तासीर में अपराध कवर करना रहा है। अपराध कवर करनेवाले हमारे साथी हमेशा से खुद को तुर्रमखां के रूप में पेश करते रहे हो, मगर सच्चाई यही है कि इन दिनों सारे के सारे अंदर ही अंदर सिहर जाने की हद तक सहमे हुए हैं। कुछ हो जाने का बाद आमतौर पर जो हालात होते हैं, उसे माहौल कहा जाता है। और हर माहौल के अपने अलग मायने हुआ करते हैं। अच्छे काम का अच्छा माहौल, बुरे काम का बुरा माहौल। पत्रकार राजीव शुक्ला के मंत्री बनने पर और संजय निरुपम के तीन बार सांसद बनने पर अपने जैसे उनके साथियों के बीच खुशी का माहौल था। लेकिन पत्रकार जिग्ना के जेल जाने और जे डे के मारे जाने पर लोगों को बुरे माहौल को जीना पड़ रहा है। इसी माहौल से अपराध कवर करने के पेशे की इस बदली हुई तासीर को समझा जा सकता है।
b जिग्ना वोरा को अपन नहीं जानते। मुंबई में सालों से पत्रकारिता करने के बावजूद बिल्कुल नहीं जानते। ना कभी कोई व्यक्तिगत मुलाकात और ना ही कभी कोई बातचीत। वैसे, आप यह जानकर अपन को बेहद अल्प संपर्कों और संबंधोंवाला पत्रकार मान सकते हैं। लेकिन जिग्ना को जानने भर से ही कोई बड़ा पत्रकार नहीं हो जाता, यह भी आप भी जानते है। दिल्ली से बहुत दूर मुंबई में रहने के बावजूद भारत सरकार के बहुत सारे मंत्री, देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री, और ढेर सारे सांसद लोग अपन और अपने कई अन्य साथियों को नितांत निजी रूप से जानते है। कईयों का घर पर भी आना जाना है। बहुत सारे राजनेताओं से अपने पारिवारिक संबंध हैं। लेकिन इस सब पर अपने को कोई गर्व या दर्प कभी नहीं रहा। मगर, दुबई की दुनिया में बैठे दानव के दो कौड़ी के किसी कमीने का भी फोन आ जाने पर अपराध कवर करनेवाले पत्रकारों को अपन ने बंदरों की तरह उछलते देखा है। अपने फोन पर अपराधी के आए किसी कॉल को हर तरह से प्रचारित करते भी उनको देखा हैं। लेकिन क्या किया जाए, यही उनका अपना स्तर है। लेकिन अपन अगर जिग्ना वोरा को गिरफ्तार होने से पहले नहीं जानते थे, तो उसके पीछे की वजह यही है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता करनेवालों का अपराध कवर करनेवालों का वास्ता बहुत कम ही पड़ता है। और यह भी सच्चाई है कि मुंबई में अपने जैसे सैकड़ों पत्रकार और हैं, जिनने कल तक जिग्ना का तो क्या जे डे का नाम भी नहीं सुना था। मगर अब सब दोनों को उनके अपने अपने हालात और हश्र की वजह से जानने लगे हैं। और यह भी जानने लगे हैं कि कौन पत्रकार किस तरह से किस अपराधी की किन शर्तों पर पत्रकारिता का कारोबार कर रहा है।
अपराध तो हमारे स्वर्गीय साथी आलोक तोमर और अमरनाथ कश्यप ने भी कवर किया था। दाऊद से लेकर छोटा शकील और इकबाल डोसा से लेकर छोटा राजन तक सबसे कई कई बार व्यक्तिगत रूप से मिलकर आलोक तोमर ने बातचीत भी की और उनके इंटरव्यू भी छापे। मगर अपराध और अपराधियों का कहीं भी, कभी भी और किसी भी रूप से महिमा मंडन कतई नहीं किया। और जानने वाले तो यह सत्य भी जानते हैं, कि उस जमाने में आलोक तोमर के भारत सरकार से गहरे संबंधों को जानकर दाऊद ने उनके सामने सरकार से बात करने का संधी प्रस्ताव भी रखा था। मगर इतने बड़े गिरोहबाज दाऊद को भी आलोक तोमर ने कहा था कि अपराधियों का दूत बनने के बजाय वे मर जाना पसंद करेंगे। आलोक तोमर का यह टका सा जवाब सुनकर दुनिया को अपने इशारों से सन्न करनेवाला दाऊद खुद सन्न था। यह उनके पत्रकारिता की पूजनीय परंपराओं को निभाने का जज़्बा था। उनकी ही तरह से और भी कई लोग आज भी देश में अपराध कवर कर रहे हैं। लेकिन कोई उन पर उंगली नहीं उठा सकता।
लेकिन जिग्ना जेल में है। जेल में इसलिए, क्योंकि अपराध की खबरों का जुगाड़ करके अपना नाम करने की कोशिश में जिग्ना खुद अपराध का अहम हिस्सा बन गई। गिरफ्तारी का कारण यही माना जा रहा है कि जिग्ना की वजह से ही जे डे इस जहां से चले गए। अपना तो यह भी मानना है कि कहने भर को भले ही जे डे की मौत के लिए जिग्ना को जिम्मेदार बताया जा रहा हो, लेकिन वास्तविक सच्चाई यह भी है कि अपने अपने हश्र के लिए दोनों ही व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार थे। जे डे के पास भी अपने जीवन में पत्रकारिता में सिर्फ अपराध ही कवर करने के अलावा और भी ढेर सारे विकल्प थे। जिग्ना भी गुंडो़ं की खबरों के अलावा अपनी दे्हयष्टि के मुताबिक कमसे कम ग्लैमर तो कवर कर ही सकती थी। लेकिन प्रकृति की परंपरा है कि दिमाग की जैसी तासीर होती है, वह आपके दिल को वैसी ही दिशा देता है और आपसे काम भी वैसा ही करवाता है। जिग्ना के जेल जाने की या जे डे के दुनिया से चले जाने का भले ही हमारे बहुत सारे अपराध कवर करनेवाले साथियों को संताप हो, मगर अपने को उनके दुख और दर्द से कोई वास्ता नहीं है। वास्ता इसलिए नहीं, क्योंकि दोनों ही पत्रकारिता करते करते अपराधियों की उंगलियों के इशारों पर काम करने लग गए थे। दोनों के मामले में अपना सिर्फ और सिर्फ यही मानना है कि यह उनका अपना ‘प्रोफेशनल रिजल्ट’ है। जिग्ना और जे डे की कहानी अपराध कवर करते करते खुद उसका हिस्सा बन जाने की है। अगर जिग्ना और जे डे तमीज़ से काम करते, तहज़ीब से पत्रकारिता करते और अपराधियों से संबंध बनाकर पत्रकारिता के पेशे की परंपरा को कलंकित नहीं करते, तो उनका यह हश्र कभी नहीं होता। यही वजह है कि इस पूरे मामले पर अपने को तो कमसे कम कोई दुख या संताप नहीं है। क्या आपको है ?
(लेखक जाने माने राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Sunday, July 24, 2011
आप न आते तो अच्छा होता
-निरंजन परिहार-
मुंबई में बम फटे। धमाके हुए। लोग मरे। और बहुत सारे घायल भी हुए। इन धमाकों के बाद सोनिया गांधी मुंबई आईं। साथ में अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लाईं। रस्म निभाने के लिए दोनों विस्फोट स्थलों पर गए। रिवाज के तहत मृतकों के परिजनों से मिले। उनको ढाढ़स बंधाया। जख्मों पर मरहम लगाने अस्पतालों में भी गए। घायलों से मिले। उनको सांत्वना दी। मुंबई के सामान्य लोग बेचारे बाग – बाग, कि तकलीफ के मौके पर देश के दो सबसे बड़े नेता शहर को संभालने दिल्ली से दौड़े चले आए। मगर क्या तो उनका आना, और क्या जाना। इस शहर की जिंदगी के असली आसमान पर मनमोहन और सोनिया गांधी का आज कोई असर नहीं है।
वे आए। मगर ना भी आए होते, तो भी यह शहर यूं ही जिंदा रहता। जिन घायलों से वे मिले, उन पर भी उनके आने का कोई असर नहीं। मंजर ठेट मारवाड़ की एक देसी कहावत जैसा है। कहावत यह है कि – ‘क्या परदेसी की प्रीत, क्या फूस का तापना। ऊठ परभात में देखिया, कोई नहीं आपणा।’ वे परदेसी की तरह आए और चले गए। रात गई, बात गई की तरह सुबह उठकर जब घायलों ने अपनी हालत निहारी तो लगा कि वे तो जस के तस हैं। वे सपने की तरह आए, और चले गए। उनके मुंबई आने का कोई फायदा नहीं हुआ। ना तो सरकार और ना ही प्रशासन, ना ही पुलिस और ना ही घायल, किसी को वास्तव में कोई फायदा नहीं। और, सच तो यह है कि विस्फोट में जो घायल हुए, वे हैरत में हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं कि ये दोनों मुंबई आए क्यूं थे ?
मान लिया जाए कि यह महज परंपरा थी। तो, सोनिया और मनमोहन के मुंबई आने, जख्मों को सहलाने और परिजनों को सांत्वना देने की परंपरा निभाने पर मारे गए लोगों को स्वर्ग में कैसा लग रहा होगा, इसका तो हालांकि किसी को नहीं पता। लेकिन हादसे में हताहत लोगों को लग रहा है कि ये दोनों नेता मुंबई में ही कुछ दिन और रहते, रोज अस्पताल आते, हर घंटे घायलों से मिलते तो ज्यादा ठीक रहता। धमाकों में घायल अपने भाई भरत शाह का सैफी अस्पताल में इलाज करवा रहे प्रवीण शाह और जीतू शाह ने बिल्कुल सही कहा - ‘लोगों के इतनी अपेक्षा पालने की वजह यही है कि ये दोनों नेता जिस दिन मुंबई में थे, अस्पतालों में थे, तब तक तो जैसा कि आम तौर पर होता है, घायलों की भी खूब सार संभाल होती रही। मगर, उनके जाने के बाद कमसे कम सरकारी अस्पतालों में भर्ती घायलों का हाल कोई बहुत ठीक ठाक नहीं है। अब सब कुछ रुटीन जैसा है। बिल्कुल वैसा ही सामान्य, जैसा मुंबई का जनजीवन हो गया है।’
दक्षिण मुंबई के सांसद मिलिंद देवड़ा हाल ही में देश के संचार राज्य मंत्री बने हैं। पिता मुरली देवड़ा के केंद्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा देने की मजबूती भरी मजबूरियों ओर उनके एवज में बेटे मिलिंद देवड़ा को मंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस की झोली भरने की मजबूरियों की बात कभी और करेंगे। फिलहाल बात सिर्फ विस्फोटों की। यह वही दक्षिण मुंबई है जिसमें ऑपेरा हाउस और जवेरी बाजार आते हैं। मिलिंद देवड़ा ही नहीं, और उनके पिता भी यहीं के लोगों के वोटों से चुने जाते रहे हैं। ताजा ताजा मंत्री का ताज पहने मिलिंद भी मनमोहन और सोनिया गांधी के साथ मुंबई आए। विस्फोट स्थलों पर गए। मारे गए लोगों के परिजनों से मिले। घायलों का हाल जानने अस्पताल भी गए। और बाद में सोनिया और मनमोहन की तरह वे भी चले गए। मिलिंद के दिल्ली लौट जाने के बाद लोगों को यह अहसास हो रहा है कि उनके वोटों से सांसद चुना गया एक लड़का, केंद्र में मंत्री पद पाते ही अब अचानक इतना बड़ा हो गया है कि वह सिर्फ देश के बड़े बड़े लोगों के साथ ही मुंबई के लोगों के दुख दर्द जानेगा। अपने पिता मुरली देवड़ा द्वारा चश्में बांटने की छोटी-छोटी खबरों का भी भरपूर प्रचार करने वाले मिलिंद देवड़ा ने अस्पतालों में जाने के अलावा और कुछ भी किया होता, तो इसकी जानकारी दुनिया को जरूर होती। मगर लोग मिलिंद के इस बार के रवैये से सन्न हैं। पर, इस सबसे देवड़ा परिवार को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। यह उनकी राजनीति का हिस्सा है। वे लोगों का उपयोग करना जानते हैं, और उनको यह भी पता है कि जनता की याददाश्त कोई बहुत मजबूत नहीं होती। विस्फोटों में घायल लोग इसलिए ज्यादा दुखी हैं, कि मिलिंद देवड़ा अपने मतदाताओं को ही भूल गए। मिलिंद और उनके पिता मुरली देवड़ा की इस मतलबी राजनीति पर भी विस्तार से कभी और। फिलहाल एक बार फिर लौटते हैं सोनिया गांधी और मनमोहन पर।
देश के ये दोनों सबसे बड़े नेता जब तक मुंबई में थे, तो मुंबई के थे। मगर जैसे ही दिल्ली पहुंचे, तो सब भूल गए। जी हां, सब कुछ। कुछ भी याद नहीं है उनको। मनमोहन सिंह को तो सोनिया गांधी की कसम देकर दिल पर हाथ रखवाकर अगर पूछ लिया जाए कि सरदारजी जरा यह बताइए मुंबई के धमाकों में कितने लोग मारे गए, तो अपने ये प्रधानमंत्री बगलें झांकने नहीं लग जाएं, तो कहना। और रही बात सोनिया गांधी की, तो इस मामले में आप भी सहमत ही होंगे कि सही मायने में हमारे इस देश में सोनिया गांधी देश के प्रधानमंत्री से भी हजार गुना बड़ी नेता हैं। और हालात जब प्रधानमंत्री जैसे छोटे से आदमी की याददाश्त के यह हैं, तो फिर सोनिया गांधी से बहुत उम्मीद करना कोई ज्यादा समझदारी का काम नहीं है।
हादसे को करीब दो सप्ताह पूरे हो रहे हैं। जब देश चलानेवाले इन लोगों के कहीं भी आने - जाने का किसी को कोई वास्तविक फायदा नहीं होता, तो पता नहीं ये लोग घटना स्थलों पर जाते क्यूं हैं। और घायलों से मिलते क्यूं हैं। विस्फोटों की जांच शुरू हो गई है। पर, धमाके करनेवालों का कोई सुराग नहीं है। वास्तविक अपराधियों का दूर दूर तक कोई अता पता भी नहीं है। मुंबई में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों यह कहकर गए थे कि बम विस्फोटों के पीछे जो लोग हैं, उनको जल्द ही ढूंढ लिया जाएगा। अपना सवाल है कि ढूंढ भी लोगे तो भी क्या कर लोगे ? साजिश करनेवालों का पता लग भी गया तो क्या हो जाएगा ? संसद पर हमला करने का साबित आरोपी अफजल गुरू दस साल से हमारे कब्जे में हैं। और मुंबई पर आतंक बनकर कहर की तरह टूट पड़ा दुर्दांत आतंकी कसाब भी हमारी कैद में है। ऐसे ही कई और आतंकवादी भी हमारे कब्जे में होने के बावजूद हमने इनको पूजने के अलावा किया क्या है?
मुंबई में बम फटे। धमाके हुए। लोग मरे। और बहुत सारे घायल भी हुए। इन धमाकों के बाद सोनिया गांधी मुंबई आईं। साथ में अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लाईं। रस्म निभाने के लिए दोनों विस्फोट स्थलों पर गए। रिवाज के तहत मृतकों के परिजनों से मिले। उनको ढाढ़स बंधाया। जख्मों पर मरहम लगाने अस्पतालों में भी गए। घायलों से मिले। उनको सांत्वना दी। मुंबई के सामान्य लोग बेचारे बाग – बाग, कि तकलीफ के मौके पर देश के दो सबसे बड़े नेता शहर को संभालने दिल्ली से दौड़े चले आए। मगर क्या तो उनका आना, और क्या जाना। इस शहर की जिंदगी के असली आसमान पर मनमोहन और सोनिया गांधी का आज कोई असर नहीं है।
वे आए। मगर ना भी आए होते, तो भी यह शहर यूं ही जिंदा रहता। जिन घायलों से वे मिले, उन पर भी उनके आने का कोई असर नहीं। मंजर ठेट मारवाड़ की एक देसी कहावत जैसा है। कहावत यह है कि – ‘क्या परदेसी की प्रीत, क्या फूस का तापना। ऊठ परभात में देखिया, कोई नहीं आपणा।’ वे परदेसी की तरह आए और चले गए। रात गई, बात गई की तरह सुबह उठकर जब घायलों ने अपनी हालत निहारी तो लगा कि वे तो जस के तस हैं। वे सपने की तरह आए, और चले गए। उनके मुंबई आने का कोई फायदा नहीं हुआ। ना तो सरकार और ना ही प्रशासन, ना ही पुलिस और ना ही घायल, किसी को वास्तव में कोई फायदा नहीं। और, सच तो यह है कि विस्फोट में जो घायल हुए, वे हैरत में हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं कि ये दोनों मुंबई आए क्यूं थे ?
मान लिया जाए कि यह महज परंपरा थी। तो, सोनिया और मनमोहन के मुंबई आने, जख्मों को सहलाने और परिजनों को सांत्वना देने की परंपरा निभाने पर मारे गए लोगों को स्वर्ग में कैसा लग रहा होगा, इसका तो हालांकि किसी को नहीं पता। लेकिन हादसे में हताहत लोगों को लग रहा है कि ये दोनों नेता मुंबई में ही कुछ दिन और रहते, रोज अस्पताल आते, हर घंटे घायलों से मिलते तो ज्यादा ठीक रहता। धमाकों में घायल अपने भाई भरत शाह का सैफी अस्पताल में इलाज करवा रहे प्रवीण शाह और जीतू शाह ने बिल्कुल सही कहा - ‘लोगों के इतनी अपेक्षा पालने की वजह यही है कि ये दोनों नेता जिस दिन मुंबई में थे, अस्पतालों में थे, तब तक तो जैसा कि आम तौर पर होता है, घायलों की भी खूब सार संभाल होती रही। मगर, उनके जाने के बाद कमसे कम सरकारी अस्पतालों में भर्ती घायलों का हाल कोई बहुत ठीक ठाक नहीं है। अब सब कुछ रुटीन जैसा है। बिल्कुल वैसा ही सामान्य, जैसा मुंबई का जनजीवन हो गया है।’
दक्षिण मुंबई के सांसद मिलिंद देवड़ा हाल ही में देश के संचार राज्य मंत्री बने हैं। पिता मुरली देवड़ा के केंद्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा देने की मजबूती भरी मजबूरियों ओर उनके एवज में बेटे मिलिंद देवड़ा को मंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस की झोली भरने की मजबूरियों की बात कभी और करेंगे। फिलहाल बात सिर्फ विस्फोटों की। यह वही दक्षिण मुंबई है जिसमें ऑपेरा हाउस और जवेरी बाजार आते हैं। मिलिंद देवड़ा ही नहीं, और उनके पिता भी यहीं के लोगों के वोटों से चुने जाते रहे हैं। ताजा ताजा मंत्री का ताज पहने मिलिंद भी मनमोहन और सोनिया गांधी के साथ मुंबई आए। विस्फोट स्थलों पर गए। मारे गए लोगों के परिजनों से मिले। घायलों का हाल जानने अस्पताल भी गए। और बाद में सोनिया और मनमोहन की तरह वे भी चले गए। मिलिंद के दिल्ली लौट जाने के बाद लोगों को यह अहसास हो रहा है कि उनके वोटों से सांसद चुना गया एक लड़का, केंद्र में मंत्री पद पाते ही अब अचानक इतना बड़ा हो गया है कि वह सिर्फ देश के बड़े बड़े लोगों के साथ ही मुंबई के लोगों के दुख दर्द जानेगा। अपने पिता मुरली देवड़ा द्वारा चश्में बांटने की छोटी-छोटी खबरों का भी भरपूर प्रचार करने वाले मिलिंद देवड़ा ने अस्पतालों में जाने के अलावा और कुछ भी किया होता, तो इसकी जानकारी दुनिया को जरूर होती। मगर लोग मिलिंद के इस बार के रवैये से सन्न हैं। पर, इस सबसे देवड़ा परिवार को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। यह उनकी राजनीति का हिस्सा है। वे लोगों का उपयोग करना जानते हैं, और उनको यह भी पता है कि जनता की याददाश्त कोई बहुत मजबूत नहीं होती। विस्फोटों में घायल लोग इसलिए ज्यादा दुखी हैं, कि मिलिंद देवड़ा अपने मतदाताओं को ही भूल गए। मिलिंद और उनके पिता मुरली देवड़ा की इस मतलबी राजनीति पर भी विस्तार से कभी और। फिलहाल एक बार फिर लौटते हैं सोनिया गांधी और मनमोहन पर।
देश के ये दोनों सबसे बड़े नेता जब तक मुंबई में थे, तो मुंबई के थे। मगर जैसे ही दिल्ली पहुंचे, तो सब भूल गए। जी हां, सब कुछ। कुछ भी याद नहीं है उनको। मनमोहन सिंह को तो सोनिया गांधी की कसम देकर दिल पर हाथ रखवाकर अगर पूछ लिया जाए कि सरदारजी जरा यह बताइए मुंबई के धमाकों में कितने लोग मारे गए, तो अपने ये प्रधानमंत्री बगलें झांकने नहीं लग जाएं, तो कहना। और रही बात सोनिया गांधी की, तो इस मामले में आप भी सहमत ही होंगे कि सही मायने में हमारे इस देश में सोनिया गांधी देश के प्रधानमंत्री से भी हजार गुना बड़ी नेता हैं। और हालात जब प्रधानमंत्री जैसे छोटे से आदमी की याददाश्त के यह हैं, तो फिर सोनिया गांधी से बहुत उम्मीद करना कोई ज्यादा समझदारी का काम नहीं है।
हादसे को करीब दो सप्ताह पूरे हो रहे हैं। जब देश चलानेवाले इन लोगों के कहीं भी आने - जाने का किसी को कोई वास्तविक फायदा नहीं होता, तो पता नहीं ये लोग घटना स्थलों पर जाते क्यूं हैं। और घायलों से मिलते क्यूं हैं। विस्फोटों की जांच शुरू हो गई है। पर, धमाके करनेवालों का कोई सुराग नहीं है। वास्तविक अपराधियों का दूर दूर तक कोई अता पता भी नहीं है। मुंबई में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों यह कहकर गए थे कि बम विस्फोटों के पीछे जो लोग हैं, उनको जल्द ही ढूंढ लिया जाएगा। अपना सवाल है कि ढूंढ भी लोगे तो भी क्या कर लोगे ? साजिश करनेवालों का पता लग भी गया तो क्या हो जाएगा ? संसद पर हमला करने का साबित आरोपी अफजल गुरू दस साल से हमारे कब्जे में हैं। और मुंबई पर आतंक बनकर कहर की तरह टूट पड़ा दुर्दांत आतंकी कसाब भी हमारी कैद में है। ऐसे ही कई और आतंकवादी भी हमारे कब्जे में होने के बावजूद हमने इनको पूजने के अलावा किया क्या है?
Saturday, July 23, 2011
आप न आते तो अच्छा होता
-निरंजन परिहार-
मुंबई में बम फटे। धमाके हुए। लोग मरे। और बहुत सारे घायल भी हुए। इन धमाकों के बाद सोनिया गांधी मुंबई आईं। साथ में अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लाईं। रस्म निभाने के लिए दोनों विस्फोट स्थलों पर गए। रिवाज के तहत मृतकों के परिजनों से मिले। उनको ढाढ़स बंधाया। जख्मों पर मरहम लगाने अस्पतालों में भी गए। घायलों से मिले। उनको सांत्वना दी। मुंबई के सामान्य लोग बेचारे बाग – बाग, कि तकलीफ के मौके पर देश के दो सबसे बड़े नेता शहर को संभालने दिल्ली से दौड़े चले आए। मगर क्या तो उनका आना, और क्या जाना। इस शहर की जिंदगी के असली आसमान पर मनमोहन और सोनिया गांधी का आज कोई असर नहीं है।
वे आए। मगर ना भी आए होते, तो भी यह शहर यूं ही जिंदा रहता। जिन घायलों से वे मिले, उन पर भी उनके आने का कोई असर नहीं। मंजर ठेट मारवाड़ की एक देसी कहावत जैसा है। कहावत यह है कि – ‘क्या परदेसी की प्रीत, क्या फूस का तापना। ऊठ परभात में देखिया, कोई नहीं आपणा।’ वे परदेसी की तरह आए और चले गए। रात गई, बात गई की तरह सुबह उठकर जब घायलों ने अपनी हालत निहारी तो लगा कि वे तो जस के तस हैं। वे सपने की तरह आए, और चले गए। उनके मुंबई आने का कोई फायदा नहीं हुआ। ना तो सरकार और ना ही प्रशासन, ना ही पुलिस और ना ही घायल, किसी को वास्तव में कोई फायदा नहीं। और, सच तो यह है कि विस्फोट में जो घायल हुए, वे हैरत में हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं कि ये दोनों मुंबई आए क्यूं थे ?
मान लिया जाए कि यह महज परंपरा थी। तो, सोनिया और मनमोहन के मुंबई आने, जख्मों को सहलाने और परिजनों को सांत्वना देने की परंपरा निभाने पर मारे गए लोगों को स्वर्ग में कैसा लग रहा होगा, इसका तो हालांकि किसी को नहीं पता। लेकिन हादसे में हताहत लोगों को लग रहा है कि ये दोनों नेता मुंबई में ही कुछ दिन और रहते, रोज अस्पताल आते, हर घंटे घायलों से मिलते तो ज्यादा ठीक रहता। धमाकों में घायल अपने भाई भरत शाह का सैफी अस्पताल में इलाज करवा रहे प्रवीण शाह और जीतू शाह ने बिल्कुल सही कहा - ‘लोगों के इतनी अपेक्षा पालने की वजह यही है कि ये दोनों नेता जिस दिन मुंबई में थे, अस्पतालों में थे, तब तक तो जैसा कि आम तौर पर होता है, घायलों की भी खूब सार संभाल होती रही। मगर, उनके जाने के बाद कमसे कम सरकारी अस्पतालों में भर्ती घायलों का हाल कोई बहुत ठीक ठाक नहीं है। अब सब कुछ रुटीन जैसा है। बिल्कुल वैसा ही सामान्य, जैसा मुंबई का जनजीवन हो गया है।’
दक्षिण मुंबई के सांसद मिलिंद देवड़ा हाल ही में देश के संचार राज्य मंत्री बने हैं। पिता मुरली देवड़ा के केंद्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा देने की मजबूती भरी मजबूरियों ओर उनके एवज में बेटे मिलिंद देवड़ा को मंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस की झोली भरने की मजबूरियों की बात कभी और करेंगे। फिलहाल बात सिर्फ विस्फोटों की। यह वही दक्षिण मुंबई है जिसमें ऑपेरा हाउस और जवेरी बाजार आते हैं। मिलिंद देवड़ा ही नहीं, और उनके पिता भी यहीं के लोगों के वोटों से चुने जाते रहे हैं। ताजा ताजा मंत्री का ताज पहने मिलिंद भी मनमोहन और सोनिया गांधी के साथ मुंबई आए। विस्फोट स्थलों पर गए। मारे गए लोगों के परिजनों से मिले। घायलों का हाल जानने अस्पताल भी गए। और बाद में सोनिया और मनमोहन की तरह वे भी चले गए। मिलिंद के दिल्ली लौट जाने के बाद लोगों को यह अहसास हो रहा है कि उनके वोटों से सांसद चुना गया एक लड़का, केंद्र में मंत्री पद पाते ही अब अचानक इतना बड़ा हो गया है कि वह सिर्फ देश के बड़े बड़े लोगों के साथ ही मुंबई के लोगों के दुख दर्द जानेगा। अपने पिता मुरली देवड़ा द्वारा चश्में बांटने की छोटी-छोटी खबरों का भी भरपूर प्रचार करने वाले मिलिंद देवड़ा ने अस्पतालों में जाने के अलावा और कुछ भी किया होता, तो इसकी जानकारी दुनिया को जरूर होती। मगर लोग मिलिंद के इस बार के रवैये से सन्न हैं। पर, इस सबसे देवड़ा परिवार को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। यह उनकी राजनीति का हिस्सा है। वे लोगों का उपयोग करना जानते हैं, और उनको यह भी पता है कि जनता की याददाश्त कोई बहुत मजबूत नहीं होती। विस्फोटों में घायल लोग इसलिए ज्यादा दुखी हैं, कि मिलिंद देवड़ा अपने मतदाताओं को ही भूल गए। मिलिंद और उनके पिता मुरली देवड़ा की इस मतलबी राजनीति पर भी विस्तार से कभी और। फिलहाल एक बार फिर लौटते हैं सोनिया गांधी और मनमोहन पर।
देश के ये दोनों सबसे बड़े नेता जब तक मुंबई में थे, तो मुंबई के थे। मगर जैसे ही दिल्ली पहुंचे, तो सब भूल गए। जी हां, सब कुछ। कुछ भी याद नहीं है उनको। मनमोहन सिंह को तो सोनिया गांधी की कसम देकर दिल पर हाथ रखवाकर अगर पूछ लिया जाए कि सरदारजी जरा यह बताइए मुंबई के धमाकों में कितने लोग मारे गए, तो अपने ये प्रधानमंत्री बगलें झांकने नहीं लग जाएं, तो कहना। और रही बात सोनिया गांधी की, तो इस मामले में आप भी सहमत ही होंगे कि सही मायने में हमारे इस देश में सोनिया गांधी देश के प्रधानमंत्री से भी हजार गुना बड़ी नेता हैं। और हालात जब प्रधानमंत्री जैसे छोटे से आदमी की याददाश्त के यह हैं, तो फिर सोनिया गांधी से बहुत उम्मीद करना कोई ज्यादा समझदारी का काम नहीं है।
हादसे को करीब दो सप्ताह पूरे हो रहे हैं। जब देश चलानेवाले इन लोगों के कहीं भी आने - जाने का किसी को कोई वास्तविक फायदा नहीं होता, तो पता नहीं ये लोग घटना स्थलों पर जाते क्यूं हैं। और घायलों से मिलते क्यूं हैं। विस्फोटों की जांच शुरू हो गई है। पर, धमाके करनेवालों का कोई सुराग नहीं है। वास्तविक अपराधियों का दूर दूर तक कोई अता पता भी नहीं है। मुंबई में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी दोनों यह कहकर गए थे कि बम विस्फोटों के पीछे जो लोग हैं, उनको जल्द ही ढूंढ लिया जाएगा। अपना सवाल है कि ढूंढ भी लोगे तो भी क्या कर लोगे ? साजिश करनेवालों का पता लग भी गया तो क्या हो जाएगा ? संसद पर हमला करने का साबित आरोपी अफजल गुरू दस साल से हमारे कब्जे में हैं। और मुंबई पर आतंक बनकर कहर की तरह टूट पड़ा दुर्दांत आतंकी कसाब भी हमारी कैद में है। ऐसे ही कई और आतंकवादी भी हमारे कब्जे में होने के बावजूद हमने इनको पूजने के अलावा किया क्या है?
Thursday, July 14, 2011
अब आतंक की राजधानी है मुंबई

-निरंजन परिहार-
मुंबई को अब तक हम देश की आर्थिक राजधानी कहते रहे हैं। कुछ लोग इसे ग्लैमर की राजधानी भी मानते हैं। गालिब के दिल बहलाने वाले ख़याल की तरह इस शहर को हम आगे भी भले ही यही उपमाएं देते रहें। मगर हकीकत यह नहीं है। आतंकवाद ने देश की इस आर्थिक राजधानी के ग्लैमर को लील लिया है। और बीते कुछेक सालों के इतिहास पर नजर डालें तो, सबसे बड़ी हकीकत यही है कि मुंबई अब सिर्फ आतंक की राजधानी है। मगर, यह शहर बार बार अपने पर लगते आतंक के इस तमगे को हर बार हटाकर फिर से अचानक अपने असली अस्तित्व में आ जाता है।
लोग इसे इस शहर की तासीर कहते हैं। लेकिन अपना मानना है कि सब कुछ अपने भीतर समेट लेने का साहस रखनेवाला समुद्र अपनी शरण में आनेवालों को भी अपना यही स्वभाव बांट देता है। मुंबई समुद्र की शरण का शहर है। अरब सागर की पछाड़ मारती लाखों लहरों को रोज सहन करने वाला मुंबई इसीलिए सब कुछ सहन कर लेता है। सुख के सावन से लेकर दुख के दावानल तक और नश्वरता की निशानियों से लेकर अमर हो जाने के अवशेषों तक, समुद्र सबको अपने आप में सहेज कर भी वह धरती के किनारों पर हिलोरें लेता हुआ जस का तस जिंदा रहता है। युगों-युगों से ऐसा ही होता रहा है। आप और हम लोग नहीं रहेंगे, तब भी ऐसा ही रहेगा, अगले प्रलय तक। इसलिए, समुद्र जैसे साहस वाले शहर मुंबई की जिंदगी फिर पटरी पर भले ही आ जाती हों, मगर हकीकत यही है कि इस शहर के दिल की दीवारें दरक गई हैं। बम धमाकों, आतंकी हमलों और ऐसे ही बाकी हादसों ने इसको भीतर से मरोड़ कर रख दिया है।
बहुत पहले से जहां-जहां, जब-जब, जो-जो होता रहा है, उसकी बात बाद में। सबसे पहले बात जवेरी बाजार, ऑपेरा हाउस और दादर की। एक बार फिर बम। फिर धमाके। धमाकों में फटते इंसान। तार तार होती इंसानियत। और फिर लाशें ही लाशें। परखच्चों में तब्दील होकर आकाश में उड़ते उन लाशों के लोथड़े। और सड़कों पर खून। कुल मिलाकर मुंबई एक बार फिर लहूलुहान। जवेरी बाजार के धनजी स्ट्रीट के नुक्कड़ की दूकानों की दीवारों पर 26 जुलाई 2003 के धमाकों का लहू अब तक लगा हुआ है। हादसे के ये निशान अब तक लोगों को उस धमाके की याद दिलाकर इस शहर को आतंकवाद के निशाने पर होने का अहसास कराते रहे हैं। लेकिन 13 जुलाई 2011 की शाम फिर जवेरी बाजार दहल गया। शाम छह 55 पर उसकी छाती पर एक जोरदार धमाका हुआ। मुंबा देवी मंदिर के पास स्थित पुराने धटना स्थल से सिर्फ 50 कदम की दूरी पर भीड़ भरी खाऊ गली में यह बम फटा। लोगों के परखच्चे उड़ गए। जमीं तो जमीं, दीवारों पर भी खून ही खून। कई घायल हो गए। भागमभाग मच गई। लोग अब जवेरी बाजार के उन पुराने निशानों के बजाय नए पैदा हुए खून के खतरनाक निशानों पर नजर डालने तक से डर रहे हैं। जवेरी बाजार के धमाके के ठीक चार मिनट पहले दादर में छह 51 और उसके बाद तीसरा धमाका शाम सात बजकर पांच मिनट पर ऑपेरा हाउस में हुआ। सिर्फ 14 मिनट में ही रोजमर्रा की तरह चलती मुंबई की जिंदगी का चेहरा अचानक और एकदम ही उलट गया। कई मौके पर ही मारे गए, तो बहुत सारे जिंदा और अधजिंदा लोग बदहवास भागते फिर रहे थे। जिन लोगों ने उस मंजर को देखा है, वे उसे सपने की तरह याद करके अब भी अवाक हो रहे हैं।
यह मुंबई में आतंकवाद के ताजा अंतर्राष्ट्रीय अवशेष है। मगर सिलसिला पूरे 18 साल पुराना है। 12 मार्च, 1993...। यह वह तारीख है, जब यह शहर, पहली बार अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के निशाने पर आया। इस तारीख को मुंबई में 13 जगहों पर बम धमाके हुए। एक के बाद एक करके हुए इन धमाकों में 257 लोग मारे गए। सैकड़ों घायल हुए। और इस तथ्य पर विश्वास कर लीजिए कि 18 साल बाद भी उन विस्फोटों के शिकार अपने शरीर में फंसे कांच के टुकड़े निकलवा रहे हैं। कुछ लोग अब भी अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं। सरकार ने इन धमाकों में 253 के मरने और 713 लोगों के घायल होने की बात कही थी। मगर 18 साल बाद आज तक लोग इन आंकड़ों पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। वे कई लोग जो इतने सालों बाद भी अब तक घर नहीं लौटे हैं। वे ना तो मरनेवालों की सरकारी सूची में दर्ज हैं और ना ही घायलों में कहीं उनका नाम। जिनके परिजनों ने अपने रिश्तेदारों की 18 बरसियां भी मना ली हैं, उन लाचार लोगों के पास इन सरकारी आंकड़ों पर अविश्वास करने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं है। यह मुंबई पर पहला आतंकवादी हमला था। जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साजिश करके बहुत ही गहन तरीके से अंजाम दिया गया था। एक पूरी तरह सोची समझी रणनीति के तहत मुंबई को निशाना बनाया गया। और उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद हर बार मुंबई को अलग अलग तरीकों से मारता रहा। कभी बसों में बम फोड़कर, कभी लोकल ट्रेनों में लाशें बिछाकर, और कभी बाजारों में बम फोड़कर तो कभी भीड़ भरे रेल्वे स्टेशनों में घुसकर खुलेआम गोलियां बरसाकर यह आतंकवाद इस शहर को डराता रहा।
सिलसिलेवार अगर हिसाब लगाया जाए, तो मार्च 1993 के चार साल बाद अगस्त 1997 में मुंबई में जुम्मा मस्जिद के पास बम फटे। जनवरी 1998 में मालाड़, उसके एक महीने बाद फरवरी 1998 में विरार, फिर दिसंबर 2002 में 2 तारीख को घाटकोपर जा रही बस में और 6 तारीख को मुंबई सेंट्रल रेल्वे स्टेशन पर बम फटे। सन 2003 में सबसे ज्यादा चार धमाके इस शहर ने झेले। 27 जनवरी को विले पार्ले, 13 मार्च को मुलुंड, 14 अप्रेल को बांद्रा और 19 जुलाई को घाटकोपर में धमाके हुए। फिर 25 अगस्त 2003 को गेटवे ऑफ इंडिया और जवेरी बाजार में एक साथ विस्ट हुए। और 26 जुलाई 2007 को एक के बाद एक करके कुल सात जगहों पर लोकल ट्रेनों में लाशें बिछीं। उसके बाद तो अक्तूबर 2009 में समंदर के रास्ते से आकर ताज और ओबरॉय होटलों सहित छत्रपति शिवाजी रेल्वे टर्मिनस के साथ साथ सरे आम सड़कों पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने देश का जो सबसे बड़ा आतंकी हमला किया, और पूरी दुनिया ने लगातार तीन दिनों तक लाइव देखा। और अब एक बार फिर जवेरी बाजार, ऑपेरा हाउस और दादर के ये ताजा बम धमाके। कुल मिलाकर 1993 से शुरू हुआ मुंबई में आतंकवाद फैलाने का यह सिलसिला अनवरत जारी है।
मुंबई कभी संगठित अपराध की राजधानी भी हुआ करता था। सरे आम सड़कों पर गोलियां चलती लोगों ने कई कई बार देखी हैं। गैंगवार देखे। बीच बाजार गुंडों को मारते और मरते देखा। कभी कभी इन हादसों में निर्दोष और निरपराध लोगों की जान भी जाते देखा। मगर इन घटनाओं ने इस शहर को इतना कभी नहीं डराया, जितना बम धमाकों ने। ऐसे मामलों में अंतरर्राष्ट्रीय संबंधों को सहेजने की कोशिश में सरकारों के काम करने का अपना एक अलग कूटनीतिक नजरिया होता है। इसलिए वे विस्फोटों मारे गए लोगों के परिजनों के दर्द से ताल्लुक रखने के बजाय कुछ वे सिर्फ कुछ नाम, कुछ तथ्य और कुछ संपर्कों के तार तलाशती रहती हैं। मगर चेहरे इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना आतंकवाद के इस चरित्र को समझना जरूरी है। राजनीति से इतर, गनीमत यह है कि जिस खाकी वर्दी को हमें कोसने की आदत पड़ चुकी है, वह बहुत ही साहसिक तरीके से काम करती दीख रही है, यह हमारे लिए राहत की बात है। खद्दर धारियों के मुकाबले खाकी धारियों की सेवा की सराहना की जानी चाहिए, कि वे आतंकवाद के इस नए चरित्र को सामने लाने के प्रयास कर रहे हैं। लोग भी इसे समझने लगे हैं। तभी तो अस्पताल में घायलों को देखने गए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को लोगों ने अंदर घुसने भी नहीं दिया। बाहर से ही भगा जिया। जबकि इसके उलट वे ही लोग पुलिस वालों के साथ पूरी तरह सहयोग करते देखे जा रहे थे। यह हमारे राजनेताओं की सामाजिक इज्जत की असलियत है। बेइज्जती का यह आलम इसलिए अधिक है, क्योंकि रोज होते हमलों और बार बार होते बम ब्लास्ट में तस्वीर बिल्कुल साफ होने के बावजूद के हमारे राजनेताओं को सीधे सीधे पाकिस्तान का नाम लेने में शर्म आती है। ठीक वैसे ही जैसे, ठेट गांव की बहुत सारी महिलाएं अपनी शर्मीली अदाओं को जाहिर करते हुए अपने पति का नाम लेने के बजाय को‘उनको’ कह कर इंगित करती है। यह पाकिस्तान जैसे कोई देश नहीं हुआ, हमारे राजनेताओं के पति का नाम हो। सो, वे अकसर इसको पड़ोसी देश कहते हैं। हमारे देश से थोड़ा बाहर जाकर बाकी देशों के नेताओं को हमारे मामलों में भी देखें, तो वे भी हमारे हादसों पर सिर्फ सांत्वना देते हुए संयम बरतने की सलाह देते हैं। लानत उन पर भी है, क्योंकि कोई भी मामले की तह तक जाकर आतंकवाद के खात्मे पर होनेवाले प्रयासों में सहभागी बनने की बात नहीं करता।
सालों-साल से अपराध की राजधानी होने के बावजूद मुंबई की सामान्य जिंदगी पर उसका प्रकट असर आमतौर पर कभी नहीं देखा गया। देसी धुन और परदेसी संगीत के किसी रिमिक्स की तर्ज पर हर हादसे के बाद हर बार यह शहर अपनी संगीतमयी रफ्तार में बहता रहता है। कुछ लोग इसे इस शहर के लोगों का जज़्बा कहते हैं। मगर हकीकत यह है कि यह जज़्बा नहीं, जिंदगी को जीने की जरूरत हुआ करती है, जो घर से निकलने के लिए लोगों को मजबूर करती है। काम पर नहीं पहुंचेंगे, तो कमाएंगे कैसे। दफ्तर नहीं जाएंगे, तो नौकरी से निकाल दिए जाएंगे। घर में ही बैठे रहे, तो जिंदगी का एक पूरा दिन बिना कमाई के ही गुजर जाएगा। सो, कृपा करके इन मजबूरियों को जज़्बा कहकर जज़्बे के जीवट को जार-जार मत कीजिए। जज़्बा तो जीवन को जीतने की जिद का नाम हुआ करता है जनाब ! जिंदगी की मजबूरियों को ढोने को जज़्बा नहीं कहते। हर हादसे के तत्काल बाद मजबूरियों के मारे लोग घरों से निकलते तो हैं, दफ्तरों के लिए बाहर आते तो हैं और दूकानें भी सजाते हैं। लेकिन दिल में अपनों के जिंदा रहने की दूआ और चेहरे पर कभी भी कुछ भी घट जाने का अजब आतंक साफ देखा जा सकता है। उसकी वजह यही है कि आतंक अब इस शहर की धमनियों में धंस कर पसलियों तक पसर चुका है। इसीलिए आर्थिक नहीं, अपराध की नहीं और ग्लैमर की भी नहीं, मुंबई अब सिर्फ आतंक की राजधानी है। है कि नहीं ?
(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और जाने-माने पत्रकार हैं।)
Thursday, July 7, 2011
मीडिया ने मार दिया मालदार मारन को

-निरंजन परिहार-
पहले तहलका। उसके बाद इकोनॉमिक टाइम्स। उनके साथ पूरे देश का मीडिया। फिर सीबीआई। और अब इस देश में सबकी माई ‘बाप’ सुप्रीम कोर्ट। दयानिधि मारन की हवा टाइट है। अब बोलती बंद है। लेकिन कुछ दिन पहले तक बहुत फां-फूं कर रहे थे। तहलका ने जब सबसे पहले मामला सामने लाया तो उसको मानहानि का दावा ठोंकने की धौंस दिखाई। इकोनॉमिक टाइम्स ने खबर छापी तो उसको भी डराने की कोशिश की। मगर पहले भारत सरकार के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल यानी सीएजी ने मारन के चोर होने की बात कही तो दयानिधि की सांस हलक में ही अटक गईं। और अब जब, सीबीआई ने इस देश में सबकी माई ‘बाप’ सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मारन ने बहुत माल कमाया है, तो बोलती बिल्कुल बंद हो गई है। मीडिया ने आईना दिखाया तो, आंख दिखा रहे थे। मानहानि की धोंस दिखाई। कोर्ट में घसीटने के नोटिस दे दिए। अब क्या सीएजी और सीबीआई को भी कोर्ट में घसीटोगे ? और सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया तो उसको कौनसी कोर्ट में बुलाओगे मारन !
दयानिधि और उनके भाई कलानिधि मारन तीन अरब डॉलर के मालिक हैं। और भारत के अमीरों की सूची में बीसवें नंबर के सबसे अमीर आदमी माने जाते हैं। फिर भी पेट भरा नहीं, तो देश लूटने के लिए दक्षिण से देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गए। बहुत भोली सी सूरत और बेहद मासूम दिखनेवाले दयानिधि मारन के अपने ही कुल के साथ किए कपट की किताब के पन्ने कभी और पलटेंगे। आज बात सिर्फ इसी पर कि कॉरपोरेट कल्चर से राजनीति में आए मारन ने अपनी चोरी छुपाने के लिए मीडिया को उसके खिलाफ ही हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की। उनके सन टीवी पर खूब दिखाया गया कि तहलका और टाइम्स झूठ बोल रहे हैं। बाकी मीडिया भी तहलका और टाइम्स के हवाले से जो कह रहा है, वह हलाहल झूठ है। मगर मामला जमा नहीं। मारन मीडिया को मरोड़ने चले थे, मगर खुद ही मुड़े हुए नजर आ रहे हैं। अब उनकी राजनीतिक मौत तय है।
दयानिधि मारन चोर है। देश के चोर। यह साबित हो रहा हैं। इस चोर की पोलपट्टी अब सबके सामने है। लेकिन एक बहुत पुरानी कहावत है कि साधु का भेस धारण करनेवाले चोर की जब पोल खुलती है, तो वह अपने ईमानदार होने का ढोल भी कुछ ज्यादा ही जोर से पीटता है। देश के टेलीकॉम मंत्रालय को अपने सन टीवी के फायदे की दूकान के रूप में देखने वाले दयानिधि मारन इसी कहावत पर चल रहे थे। इसीलिए मीडिया को डरा रहे थे। तहलका ने जब कहा कि मारन ने अपने सन टीवी को फायदा पहुंचाने के लिए एयरसेल को अपनी और उसकी, दोनों की औकात से भी बहुत बाहर जाकर बड़ा फायदा दिया। तो मारन ने जोरदार विरोध किया। मामला इज्जत का था। सो, दुनिया भर के मीडिया को बुला - बुलाकर खुद के बेदाग और ईमानदार होने की बात कही। मगर सवाल तहलका की इज्जत का भी था, सो, तहलका डटा रहा। मारन ने नोटिस भेजी। फिर मानहानि का दावा भी ठोंक दिया। यही खबर जब इकोनॉमिक टाइम्स ने देश को दी, तो बराबर उसी तर्ज पर मारन ने उसे भी धमकाने की कोशिश की। रोज मीडिया के सामने आ-आकर चीख-चीख कर मारन ने कहा कि मीडिया बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। मारन ने सोचा था कि उनके सनटीवी में जिस तरह से खबरें दबाई जाती है और जिस तरह खबरों को दबाने के बदले दबाकर माल लिया जाता है, वैसा ही किया तो मीडिया यही समझेगा कि मारन ने घोटाला तो किया है। सो, धमकाने का यह दूसरा पैतरा अपनाया।
इकोनॉमिक टाइम्स तो मारन की धोंस पर चुप सा हो गया। वह बनिये की दूकान है। वहां खबरें खुलेआम बिकती हैं। उनके ही टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ फोकट में मिलनेवाले बॉम्बे टाइम्स जैसे लोकल टाइम्सों को तो हर शहर में बाकायदा ‘एंटरटेनमेंट प्रमोशनल फीचर’ की घोषणा के साथ ही खबरों की खरीद फरोख्त के लिए बीच बाजार खड़ा किया गया है। नवभारत टाइम्स में भी हर मंगलवार को रेस्पोंस फीचर के नाम से पैसे लेकर वीडियोकॉन के मालिक विशुद्ध व्यापारी वेणुगोपाल धूत को संतों की श्रेणी में खड़ा करने की कोशिश हो ही रही है। सो, मारन के मामले में ‘टाइम्स’ से कोई बहुत उम्मीद किसी को नहीं थी। लेकिन तहलका डरनेवाला आइटम नहीं है। फिर तहलका के लोग कोई हरामखोरी के पैसे पर पलनेवाले प्राणी भी नहीं हैं। तहलका भिड़ा रहा। लगातार कहता रहा कि मारन ने मजबूती से मलाई काटी है। बाद में तो खैर सीएजी की रिपोर्ट भी आ गई। तो सभी ने यह खबर पढ़ाई और दिखाई भी कि टेलीकॉम सर्किल के आवंटन की एवज में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन ने रिश्वत लेने का कॉर्पोरेट रास्ता खोलते हुए किस तरह अपनी कंपनी ‘सन टीवी डाइरेक्ट’ में मलेशिया की एक मामूली सी दूरसंचार कंपनी मेक्सस से निवेश के रूप में 830 करोड़ रुपए लिए। अब सीबीआई ने भी यही बात कही है। और सीबीआई कोई हवा में बात नहीं करती। वह तथ्यों को तोलती है। फिर बोलती है। और सारे सबूतों के साथ पोल खोलती है। इसीलिए मामला सुप्रीम में है। अब शिकंजा वहीं से कस रहा है। तो, मारन मौन हैं। सिट्टी – पिट्टी गुम है। मीडिया ने आईना दिखाया तो उसे गलत बताकर धमकाने लगे थे। अचानक बहुत ताकत दिखाने लगे थे। अब उसी बात को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा तो फिर सीबीआई को भी तो कोर्ट में खींचो ना भाई। मीडिया को तो बहुत ताकत दिखा रहे थे। अब वह ताकत कहां घुस गई? बोलो मारन ?
(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
Thursday, June 30, 2011
उस सनी देओल को आप इतना नहीं जानते !


-निरंजन परिहार -
सनी देओल मिले थे। वैसे ही हैं, जैसे आपको फिल्मों में दिखते हैं। मजबूत, दमदार और एकदम गबरू जवान। बिल्कुल वैसे हैं, जैसे बरसों पहले अपन उनसे पहली बार मिले थे। पचपन साल की उमर में भी एकदम जवान पट्ठे की तरह दिखना और उससे भी ज्यादा फूर्तिला होना, वाकई बहुत कमाल की बात है। लेकिन उससे भी बड़े कमाल की बात यह है कि 30 बरस पहले अपनी पहली सुपर हिट फिल्म ‘बेताब’ में संजय गांधी की सहेली रुखसाना सल्तान की बेटी अमृतासिंह के साथ पहलगाम की पहाडियों में प्रेमालाप करते हुए वे जितने भोले और जितने मासूम लग रहे थे। वही भोली सी सूरत और उस पर तैरती निश्छल शर्मीली मुस्कान इतने सालों बाद आज भी उनके चेहरे पर जस की तस तारी है। फिल्मों की जिंदगी में दुनियादारी इस कदर हावी है कि अच्छे – भले लोग सिर्फ दो चार साल में ही ठिकाने लग जाते हैं। लेकिन लगातार इतने सालों तक इतना सारा भरपूर थका देनेवाला काम करने के बावजूद खुद को इस कदर सालों बाद भी लड़कपन में ही अटकाए रखना अपने आप में बहुत हैरत में डालनेवाली बात है।
मगर जो लोग सनी को जानते हैं, वे यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि दुनिया को हैरत में डालना उनकी आदत का हिस्सा है। दुनिया उनकी इसी तरह की दमदार दीवानगी पर दंग होती रही है। अब वे एक नया पराक्रम करने जा रहे हैं। पराक्रम यह है कि बाइस साल पहले सनी देओल ने जिस फिल्म में बहुत धांसू और बेहद धूंआधार रोल किया था, अब जाकर वे उस ‘घायल’ का सीक्वल बनाने जा रहे हैं। लोगों को ज्यादा हैरत इसलिए हो रही है, क्योंकि जमाना बहुत तेजी का है। सीक्वल के लिए साल - दो साल तो ठीक, पर 22 साल....! लोग कल देखी फिल्म की कहानी भूल जाते हैं। ऐसे में इतने सालों बाद ‘घायल’ का सिक्वल ! मगर, अपने बारे में लोगों की धारणा को अकसर गलत साबित करना उनका इतिहास रहा हैं। और बने बनाए मिथक उलट कर रख देना उनकी फितरत में शामिल है। सनी इसीलिए पूरी ताकत से ‘घायल’ का सिक्वल बनाने में जुट गए हैं।
अपनी दोनों हाथों की उंगलियों को एक दूसरी के बीच भींचने के बाद जो मट्ठी बनती हैं, वह महाभारत की कहानियों में भले ही दूसरों पर प्रहार के लिए काम आती रही हो। लेकिन सनी देओल अपने दोनों घुटनों पर दोनों कोहनियों को रखने के बाद उस मुट्ठी पर अपनी ठुड्डी को टिकाते हैं। और, इसके बाद जो दृश्य बनता है, वह बहुत गजब होता है। उनकी इस अदा की कॉपी देश और दुनिया के करोड़ों लोग करते हैं। ‘बेताब’ की शूटिंग के लिए पहलगाम जाने से पहले राजस्थान में अपने गांव माउंट आबू में सनी देओल लोकेशंस देखने आए थे। वह अपने स्कूल का जमाना था, और अपना पहली बार वहीं उनसे सामना हुआ था। घुटने, कोहनी, मुट्ठी और ठुड्डी के मेल की यह अदा तब भी सनी की जिंदगी में थी। और आज भी है। लगता है, घुटने, कोहनी, मुट्ठी और ठुड्डी के इस मजबूत मेल से ही सनी को और मजबूती मिलती है। इसीलिए ‘घायल’ के सिक्वल के सवाल पर अपनी इसी अदा को फिर बनाने के बाद अचानक बहुत निश्चिंत दिख रहे सनी ने कहा - ‘घायल रिटर्न्स’ को भी लोग वैसे ही पसंद करेंगे, जैसे ‘घायल’ को अपनाया था। अगले साल हमारी यह फिल्म आ जाएगी।’
सनी देओल इस फिल्म के जरिए एक बार फिर अपने असली अवतार में आने की तैयारी में हैं। बहुत जोशीले, धमाकेदार और सुपर एक्शन किंग के रोल में। सनी बता रहे थे कि एक लंबे वक्त के बाद ‘घायल रिटर्न्स’ उनकी एक कंप्लीट एक्शन फिल्म होगी और उनको यह विश्वास है कि लोग इसको जरूर पसंद करेंगे। यह ‘घायल’ के आगे की कहानी है। हालांकि फिल्म जगत के जानकार ही नहीं फिल्मों की थोड़ी बहुत जानकारी रखनेवाले भी इस तथ्य से बेहतर वाकिफ हैं कि किसी भी बेहतरीन फिल्म के सारे पैरामीटर पर ‘घायल’ एकदम परफैक्ट फिल्म थी। लेकिन इतने सालों बाद सीक्वल क्यों ? तो सनी बोले - ‘यह सही है कि 22 साल का वक्त कोई कम नहीं होता। फिर इतने सालों बाद भी ‘घायल’ के एक्शन, इमोशंस, कैरेक्टर, डायलॉग आदि हर मामले पर लोग अब भी बातें करते हैं। ‘घायल’ आज भी लोगों के दिलो-दिमाग पर छाई हुई है।’ अपना मानना है कि सनी के लिए यही सबसे बड़ी मुश्किल भी है कि इतने सालों बाद भी ‘घायल’ का एक एक सीन याद है दर्शकों को। उनको भले ही यह सब सुनने में बहुत अच्छा लगे, लेकिन यही सनी के सामने सबसे बड़ा चैलेंज भी है। हम जब दुनिया की अपेक्षाओं से भी कई गुना ज्यादा बड़ा काम कर लेते हैं, तो उससे भी बड़ा करने काम में बहुत सारी तकलीफें आती हैं। मगर ‘घायल रिटर्न्स’ टीजर देखकर साफ लगता है कि इस चैलेंज को सनी ने स्वीकार कर लिया है। टीजर में सनी ने खुद को बहुत मजबूती से इसीलिए पेश किया है, ताकि ‘घायल रिटर्न्स’ में वे खुद को ‘घायल’ से भी बहुत ज्यादा अच्छा पेश कर सकें।
दरअसल, सनी की मुश्किल यह है कि वे बाकी अभिनेताओं की तरह नहीं हैं। वे अपने काम से प्यार भी करते हैं। सिर्फ एक्टिंग नहीं करते। जो कुछ भी करते हैं, पूरे मन से करते हैं। और पूरी फिल्म का भार अपने कंधों पर ढोए रहते हैं। कभी पीठ दर्द उनको बहुत सताता था। पर, सनी की हालात से लड़ने की ताकत के सामने वह भी हार गया। पता ही नहीं चला, कब साथ छोड़ गया। हिम्मत उनमें गजब की है। लेकिन चेहरे की मासूम मुस्कान की तरह ही सतत काम करते रहने की आदत अभी भी छूटी नहीं है। थकते ही नहीं। अपन राजनीति के आदमी हैं। फिल्मों और उनमें काम करनेवाले कलाकारों के दर्शन के दीवाने नहीं। मगर, मुंबई के गोरेगांव इलाके में सनी ने अपने को मिलने बुलाया था, वहां अपन शाम को थोड़े देर से ही पहुंचे, तो पता चला कि कुछ और वक्त लगेगा। वे सुबह से ही तपती धूप में लगातार आठ घंटे से शूटिंग कर रहे हैं। लेकिन इतने लंबे वक्त से सतत काम कर रहे सनी जब अपने पास पहुंचे, तो आश्चर्यजनक रूप से बिल्कुल फ्रेश थे। यह उनके मन की मजबूती थी, जो तन की थकान को भीतर घुसने ही नहीं देती। सामने आते ही अपनी परिचित शर्मीली मुस्कान के साथ स्वागत की मुद्रा में हाथ आगे करके बोले – चलिए, बात कर लेते हैं। लेकिन पहले चाय पी लेते हैं। बात शुरू हुई, तो मजा आने लगा। आम तोर पर देओल खानदान के लोग बहुत कम बोलते हैं, लेकिन सनी देओल बोले। बहुत बोले और जमकर बोले। बहुत सारे विषयों पर बहुत तरह की बहुत लंबी बात। इन्हीं बातों में सनी ने मन के इतने सारे राज खोले कि अब अपन कम से कम यह दावा तो कर ही सकते हैं कि सनी देओल को अपन जितना जानते हैं, बहुत कम लोग जानते होंगे। लेकिन जो भी बातें हुईं, उनका का सार यही है कि सनी देओल सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं है। वे भावुक और संवेदनशील तो हैं ही, दुनियादारी के हर मामले और उनके मर्म को भी गहराई से समझते हैं। फिलम जगत के बहुत बड़े बड़े लोगों से अपन पहले भी कई बार मिले हैं। इसलिए अपन यह तो कह ही सकते हैं कि बाकी बहुत सारे अभिनेताओं के मुकाबले सनी देओल हर मामले में बहुत उंचे आदमी हैं।
सनी से हुई जिंदगी के अहसास, उसकी उलझनें, सुख-दुख, उसके उतार-चढ़ाव और बाकी बहुत सारी बातें कभी और। लेकिन फिलहाल इतना ही कि भले ही बीच में लगातार कई फिल्में फ्लॉप रहीं, ‘जो बोले सो निहाल’, ‘बिग ब्रदर’, ‘नक्शा’, ‘बिग ब्रदर’ आदि ने तो बॉक्स ऑफिस पर पानी भी नहीं मांगा। आलोचकों ने यहां तक कह दिया कि अपनी एक्शन के जरिए बड़े परदे पर एकछत्र राज करनेवाला यह अभिनेता अब थक चुका है। लेकिन अपनी ताकत के अलावा किसी और की परवाह करना सनी की आदत में नहीं है। यही वजह है कि ‘घातक’, ‘घायल’, ‘दामिनी’, ‘अर्जुन’, ‘त्रिदेव’, ‘सल्तनत’, ‘नरसिम्हा’,‘समंदर’, ‘डकैत’, ‘बॉर्डर’, ‘गदर’, जैसी कई सुपरहिट फिल्मों को अकेले अपने कंधों पर ढोकर सफलता दिलानेवाला यह हीरो पता नहीं क्यों हर बार पहले से बहुत ज्यादा ज्यादा ताकतवर लगता है। 19 अक्टूबर, 1956 को दिल्ली में जन्मे सनी देओल के बचपन के बेहद संकोची और शर्मीले स्वभाव को देखकर उनकी माता प्रकाश कौर को यह कतई अंदाज नहीं था, कि वे कभी अपने बेटे को जीवन के आज के मुकाम पर देखेंगी भी। लेकिन अपने हुनर, अपनी कला, अपनी मेहनत और अपनी मासूमियत से आज सनी दुनिया को दंग करते देखे जा सकते हैं। धारणाएं तोड़ना उनको आता है, और बने बनाए मिथक उलटकर आवाम को अवाक कर देने की हालत में खड़ा कर देने की अदा उनकी आदत का हिस्सा है। जिनको इस बात पर भरोसा नहीं हो, वे पिता धर्मेंद्र और भाई बॉबी देओल के साथ ‘यमला, पगला, दीवाना’ में उनके अभीभूत कर देने वाले अंदाज अब भी देख सकते हैं। इसीलिए भरोसा किया जाना चाहिए कि अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो ‘घायल रिटर्न्स’ भी वैसा कुछ करेगी, जैसा सनी की बहुत सारी फिल्में करती रही हैं। कहनेवाले तब भी कोई कम नहीं थे। बहुत लोग, बहुत पहले से बहुत कुछ कह रहे थे। लेकिन आप भी गवाह हैं कि इस सबके बावजूद ‘गदर – एक प्रेम कथा’ ने बॉलीवुड़ की सबसे सफलतम फिल्म साबित होकर सबके मुंह बंद किए ही थे ना ! सनी देओल इस बार भी ऐसा ही कुछ करके इस बार फिर मैदान मारने की फिराक में हैं। इंतजार कीजिए। (प्राइम टाइम इंडिया)
Monday, June 27, 2011
...मगर खबरें अभी और भी हैं !


-निरंजन परिहार-
वह शुक्रवार था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया। और हमारे एसपी को लील गया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे चौदह साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं है। ऐसा बहुत लोग मानते हैं। लेकिन अपन नहीं मानते। वे जिंदा है, आप में, हम में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। यह हमको एसपी ने सिखाया। वे सिखा ही रहे थे कि..... चले गए।
एसपी। जी हां, एसपी। गाजीपुर गांव के सुरेंद्र प्रताप सिंह को इतने बड़े संसार में इतने छोटे नाम से ही यह देश जानता हैं। वह आज ही का दिन था, जब टेलीविजन पर खबरों का एकदम नया और गजब का संसार रचनेवाला एक सख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था। जिसे पूरे देश में समान रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। देश के इस राष्ट्रीय टेलीविजन के मेट्रो चैनल की इज्ज्त एसपी की वजह से बढ़ी। क्योंकि वे उस पर रोज रात दस बजे खबरें लेकर आते थे। पर, टेलीविजन के परदे से पार झांकता, खबरों को जीता, दृश्यों को बोलता और शब्दों को तोलता वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, वह ‘आजतक’ कोई और नहीं कर पाया। 27 जून, 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई – ‘एसपी सिंह नहीं रहे।’ और दुनिया भर को दुनिया भर की खबरें देनेवाला एक आदमी एक झटके में खुद खबर बन कर रह गया। मगर, यह खबर नहीं थी। एक वार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। रात के दस बजते ही पूरे देश को जिस खिचड़ी दढ़ियल चेहरे के शख्स से खबरें देखने की आदत हो गई थी। वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देनेवाला प्रहार था।
अपने जीवन के आखरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी ने तनिक व्यंग्य में कहा था – ‘मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है।’ टेलीविजन पर यह एसपी के आखरी शब्द थे। एसपी ने यह व्यंग्य उस तंत्र पर किया था, जो मानवीय संवेदनाओं को ताक में रखकर जिंदगी को सिर्फ नफे और नुकसान के तराजू में तोलता है। उस रात का वह व्यंग्य एसपी के लिए विड़ंबना बुनते हुए आया, और उन्हें लील गया। इतने सालों बाद भी अपना एसपी से एक सवाल जिंदा है, और वह यही है कि - खबरें तो अभी और भी थीं एसपी... और जिंदगी भी अपनी रफ्तार से चलती ही रहती, पर आप क्यों चले गए। इतने सालों बाद आज भी हमको लगता है, कि न्यूज टेलीविजन और एसपी, दोनों पर्याय बन गए थे एक दूसरे का। ‘आजतक’ को जन्म देने, उसे बनाने, सजाने – संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने ‘आजतक’ को ही अपना पूरा जीवन भी दान कर दिया। जीना मरना तो खैर अपने हाथ में नहीं है, यह अपन जानते हैं। मगर फिर भी, यह कहते हैं कि एसपी अगर ‘आजतक’ में नहीं होते, तो शायद कुछ दिन और जी लेते।
वह ‘बॉर्डर’ थी, जो एसपी की जिंदगी की भी ‘बॉर्डर’ बन आई थी। सनी देओल के बेहतरीन अभिनय वाली यह फिल्म देखने के लिए दिल्ली के ‘उपहार’ सिनेमा में उस दिन बहुत सारे बच्चे आए थे। वहां भीषण आग लग गई और कई सारे बच्चों के लिए वह सिनेमाघर मौत का ‘उपहार’ बन गया। बाकी लोगों के लिए यह सिर्फ एक खबर थी। मगर बेहद संवेदनशील और मानवीयता से भरे मन वाले एसपी के लिए यह जीवन का सच थी। जब बाकी बुलेटिन देश और दुनिया की बहुत सारी अलग अलग किस्म की खबरें परोस रहे थे, तो उस शनिवार के पूरे बुलेटिन को एसपी ने ‘बॉर्डर’ और ‘उपहार’ को ही सादर समर्पित कर दिया। टेलीविजन पर खबर परोसने में यह एसपी का अपना विजन था। शनिवार सुबह से ही अपनी पूरी टीम को लगा दिया। और शाम तक जो कुछ तैयार हुआ, उस बुलेटिन को अगर थोड़ा तार तार करके देखें, तो उसमें एसपी का एक पूरा रचना संसार था। जिसमें मानवीय संवेदनाओं को झकझोरते दृश्यों वाली खबरों को एसपी ने जिस भावुक अंदाज में पेश किया था, उसे इतने सालों बाद भी यह देश भूला नहीं है। दरअसल, वह न्यूज बुलेटिन नहीं था। वह कला और आग के बीच पिसती मानवीयता के बावजूद क्रूर अट्टहास करती बेपरवाह सरकारी मशीनरी और रुपयों की थैली भरनेवाले सिनेमाघरों के स्वार्थ की सच्चाई का दस्तावेज था। एसपी ने उस रात के अपने इस न्यूज बुलेटिन में इसी सच्चाई को तार तार किया, जार जार किया और बुलेटिन जैसे ही तैयार हुआ, एसपी ने बार बार देखा। फिर धार धार रोए। जो लोग एसपी को नजदीक से जानते थे, वे जानते थे कि एसपी बहुत संवेदनशील हैं, मगर इतने...? दरअसल, एसपी के दिमाग की नस फट गई थी। जिन लोगों ने शुक्रवार के दिन ‘बॉर्डर’ देखने ‘उपहार’ में आए बच्चों की मौत के मातम भरे मंजर को समर्पित शनिवार के उस आजतक को देखा है, उन्होंने चौदह साल बाद भी आजतक उस जैसा कोई भी न्यूज बुलेटिन नहीं देखा होगा, यह अपना दावा है। और यह भी लगता है कि हृदय विदारक शब्द भी असल में उसी न्यूज बुलेटिन के लिए बना होगा। एसपी की पूरी टीम ने जो खबरें बुनीं, एसपी ने उन्हें करीने से संवारा। मुंबई से खास तौर से ‘बॉर्डर’ के गीत मंगाए। उन्हें भी उस बुलेटिन में एसपी ने भरा। धू – धू करती आग, जलते मासूम, बिलखते बच्चे, रोते परिजन, कराहते घायल, सम्हालते सैनिक, और मौन मूक प्रशासन को परदे पर लाकर पार्श्व में ‘संदेसे आते हैं...’ की धुन एसपी ने इस तरह सजाई गई कि क्रूर से क्रूर मन को भी अंदर तक झकझोर दे। तो फिर एसपी तो भीतर तक बहुत संवेदनशील थे। कोई बात दिमाग में अटक गई। यह न्यूज बुलेटिन नहीं, आधे घंटे की पूरी डॉक्यूमेंट्री थी। और यही डॉक्यूमेंट्रीनुमा न्यूज बुलेटिन एसपी के दिमाग की नस को फाड़ने में कामयाब हो गया।
जिंदगी से लड़ने का जोरदार जज्बा रखनेवाले एसपी अस्पताल में पूरे तेरह दिन तक उससे जूझते रहे। मगर जिंदगी की जंग में आखिर हार गए। सरकारी तंत्र की उलझनभरी गलियों में अपने स्वार्थ की तलाश करनेवालों का असली चेहरा दुनिया के सामने पेश करनेवाले अपने आखरी न्यूज बुलेटिन के बाद एसपी भी आखिर थक गए। बुलेटिन देखकर अपने दिमाग की नस फड़वाने के बाद तेरह दिन आराम किया और फिर विदाई ले ली। पहले राजनीति की फिर पत्रकारिता में आए एसपी ने 3 दिसंबर 1948 को जन्मने के बाद गाजीपुर में चौथी तक पढ़ाई की। फिर कलकत्ता में रहे। 1964 में बीए के बाद राजनीति में आए, पर खुद को खपा नहीं पाए। सो, 1970 में कलकत्ता मंई खुद के नामवाले सुरेंद्र नाथ कॉलेज में लेक्चररी भी की। पर, मामला जमा नहीं। दो साल बाद ही ‘धर्मयुग’ प्रशिक्षु उप संपादक का काम शुरू किया। फिर तो, रुके ही नहीं। रविवार, नवभारत टाइम्स और टेलीग्राफ होते हुए टीवी टुडे आए। और यहीं आधे घंटे का न्यूज बुलेटिन शुरू करने का पराक्रम किया, जो उनसे पहले इस देश में और कोई नहीं कर पाया। वे कालजयी हो गए। कालजयी इसलिए, क्योंकि दृश्य खबरों के संसार का जो ताना बाना उनने इस देश में बुना, उनसे पहले और उनके बाद और कोई नहीं बुन पाया।
टेलीविजन खबरों के पेश करने का अंदाज बदलकर एसपी ने देश को एक आदत सी डाल दी थी। आदत से मजबूर उन लोगों में अपने जैसे करोड़ों लोग और भी थे। लेकिन मीडिया में अपन खुद को खुशनसीब इसलिए मानते हैं, क्योंकि अपन एसपी के साथ जब काम कर रहे थे, तो उनके चहेते हुआ करते थे। अपन इसे अपने लिए गौरव मानते रहे हैं। एसपी जब टेलीविजन के काम में बहुत गहरे तक डूब गए थे, तो उनने एक बार अपन से कहा था जो वे अकसर कईयों को कहा करते थे – ‘यह जो टेलीविजन है ना, प्रिंट मीडिया के मुकाबले आपको जितना देता है, उसके मुकाबले आपसे कई गुना ज्यादा वसूलता है।’ एसपी ने बिल्कुल सही कहा था। टेलीविजन ने एसपी को शोहरत और शाबासी बख्शी, तो उसकी कीमत भी वसूली। और, यह कीमत एसपी को अपनी जिंदगी देकर चुकानी पड़ी। मगर आपने तो आखरी बार भी यही कहा था एसपी कि - ‘जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है।’ पर, जिंदगी तो थम गई। मगर खबरें अभी और भी हैं...! (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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